लोकसभा में महिला आरक्षण लागू करने और सदन की सीटों की संख्या बढ़ाने से संबंधित संविधान संशोधन विधेयक शुक्रवार को पारित नहीं हो सका। विधेयक को आवश्यक दो-तिहाई बहुमत नहीं मिल पाया, जिसके चलते यह गिर गया। मतदान में 298 सांसदों ने विधेयक के पक्ष में जबकि 230 सांसदों ने विरोध में वोट दिया।
संविधान संशोधन के लिए सदन में उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का कम से कम दो-तिहाई समर्थन जरूरी होता है। हालांकि सरकार को साधारण बहुमत से अधिक समर्थन मिला, लेकिन यह संवैधानिक आवश्यकता को पूरा नहीं कर सका।
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विधेयक के खारिज होने के बाद केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया कि वह इससे जुड़े दो अन्य विधेयकों को आगे नहीं बढ़ाएगी। संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजू ने निराशा व्यक्त करते हुए कहा कि यह एक महत्वपूर्ण सुधार पर सहमति बनाने का खोया हुआ अवसर है। उन्होंने कहा कि इस बिल से लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व को मजबूत किया जा सकता था।
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बहस के दौरान गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि देश में मतदाताओं और सांसदों के अनुपात में असंतुलन है, जिसे परिसीमन (डिलिमिटेशन) के जरिए सुधारा जा सकता है। उन्होंने विपक्ष पर आरोप लगाया कि पूर्व में सत्ता में रहते हुए कांग्रेस ने परिसीमन की प्रक्रिया को बाधित किया और अब भी वह इसी रुख पर कायम है।
वहीं, विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने सरकार के प्रस्ताव की कड़ी आलोचना की। उन्होंने कहा कि यह विधेयक महिला आरक्षण से जुड़ा नहीं है, बल्कि इसके जरिए देश के चुनावी नक्शे को बदलने का प्रयास किया जा रहा है। उनका आरोप था कि इससे दक्षिणी, पूर्वोत्तर और छोटे राज्यों का प्रतिनिधित्व कम हो सकता है, जो “राष्ट्रहित के खिलाफ” है।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, इस विधेयक पर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच गहरी असहमति स्पष्ट रूप से सामने आई है। जहां सरकार इसे प्रतिनिधित्व में सुधार का कदम बता रही थी, वहीं विपक्ष इसे राजनीतिक संतुलन बदलने की कोशिश मान रहा है।
संसद की कार्यवाही दिन भर की बहस के बाद स्थगित कर दी गई और अब सदन की अगली बैठक 18 अप्रैल 2026 को होगी। इस घटनाक्रम के बाद महिला आरक्षण और परिसीमन जैसे मुद्दों पर भविष्य की रणनीति को लेकर राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है।





