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मधुबनी पेंटिंग का क्या है इतिहास ? सिंगरौली के जनप्रतिनिधियों ने किया प्रधानमंत्री को भेंट!

ब्यूरो कार्यालय

Author | Updated: 03 Aug 2026, 07:06 PM IST | 1 min read
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सिंगरौली। जिले के ग्राम सैमुअर स्थित अहिल्याबाई स्वसहायता समूह की महिलाओं द्वारा तैयार की गई पारंपरिक मधुबनी पेंटिंग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भेंट की गई। यह अवसर समूह की महिला कलाकारों के लिए गर्व का विषय बना।

जनप्रतिनिधियों ने भेंट की कलाकृति

प्रधानमंत्री को यह विशेष मधुबनी पेंटिंग राज्यमंत्री (पंचायत एवं ग्रामीण विकास) श्रीमती राधा सिंह, सांसद डॉ. राजेश मिश्र, सिंगरौली विधायक राम निवास शाह, सिहावल विधायक विश्वामित्र पाठक, धौहनी विधायक कुंवर सिंह टेकाम, देवसर विधायक राजेंद्र मेश्राम सहित अन्य जनप्रतिनिधियों द्वारा भेंट की गई।

महिलाओं की मेहनत की हुई सराहना

जनप्रतिनिधियों ने स्वसहायता समूह की महिलाओं की कलात्मक प्रतिभा, मेहनत और आत्मनिर्भरता की सराहना करते हुए कहा कि यह उपलब्धि पूरे जिले के लिए गौरव का विषय है। उन्होंने कहा कि ग्रामीण महिलाओं की प्रतिभा को राष्ट्रीय मंच तक पहुंचाना प्रेरणादायक पहल है।

प्रशिक्षण से आत्मनिर्भर बनीं महिलाएं

अहिल्याबाई स्वसहायता समूह की महिलाओं को मधुबनी कला का प्रशिक्षण उपलब्ध कराने में कलेक्टर गौरव बैनल की महत्वपूर्ण भूमिका रही। उनके मार्गदर्शन में यूनियन बैंक स्वरोजगार प्रशिक्षण संस्थान (RSETI) के माध्यम से महिलाओं को प्रशिक्षण दिया गया।

प्रशिक्षण के बाद समूह की महिलाएं अपनी पारंपरिक कला को आजीविका का साधन बनाकर आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन रही हैं।

मधुबनी पेंटिंग क्या है?

जानिए इसकी खासियत, इतिहास और पहचान

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मधुबनी पेंटिंग भारत की सबसे प्रसिद्ध लोक कलाओं में से एक है। इसे मिथिला पेंटिंग भी कहा जाता है क्योंकि इसकी उत्पत्ति बिहार के मिथिला क्षेत्र में हुई। यह चित्रकला अपनी पारंपरिक शैली, चमकीले रंगों, बारीक रेखाओं और सांस्कृतिक प्रतीकों के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है।

मधुबनी पेंटिंग में क्या खास है?

मधुबनी कला में मिथिलांचल की संस्कृति, लोक परंपराएं और धार्मिक मान्यताओं को बेहद सुंदर ढंग से चित्रित किया जाता है। इसकी प्रमुख विशेषताएं हैं..

  • चमकीले और प्राकृतिक रंगों का उपयोग।
  • बारीक रेखाओं और ज्यामितीय आकृतियों से चित्र बनाना।
  • खाली स्थान न छोड़ना, पूरी सतह को रंगों और डिजाइनों से भरना।
  • प्रकृति, देवी-देवता, विवाह, सूर्य, चंद्रमा, मछली, कमल, मोर, बांस और पेड़-पौधों का चित्रण।
  • पारंपरिक रूप से प्राकृतिक रंगों और हाथ से बने ब्रश का उपयोग।

मधुबनी कला का इतिहास

मधुबनी चित्रकला की उत्पत्ति बिहार के मिथिला क्षेत्र से मानी जाती है। लोक मान्यता के अनुसार, राजा जनक ने अपनी पुत्री सीता के विवाह के अवसर पर पूरे राज्य को सजाने के लिए कलाकारों से चित्र बनवाए थे। इसी परंपरा को आगे चलकर मधुबनी चित्रकला के रूप में पहचान मिली।

हालांकि, इतिहासकारों के अनुसार यह कला सदियों से मिथिला क्षेत्र की महिलाओं द्वारा घरों की दीवारों और आंगनों पर बनाई जाती रही है।

मधुबनी कला किसने शुरू की?

मधुबनी चित्रकला किसी एक व्यक्ति द्वारा विकसित नहीं की गई। यह मिथिला क्षेत्र की महिलाओं की सामूहिक लोक कला है, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती रही।

आधुनिक दौर में इस कला को वैश्विक पहचान दिलाने का श्रेय कई कलाकारों को जाता है, जिनमें सीता देवी (1914–2005) का नाम प्रमुख है।

सबसे प्रसिद्ध मधुबनी पेंटिंग

मधुबनी कला की सबसे चर्चित कृतियों में सीता देवी की ‘कोहबर घर’ पेंटिंग शामिल है।

इस चित्र में विवाह कक्ष को कमल, मछली, बांस, सूर्य और अन्य उर्वरता के प्रतीकों के माध्यम से दर्शाया गया है। मधुबनी कला को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने में उनके योगदान के लिए उन्हें 1981 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया था।

‘कोहबर’ क्या होता है?

कोहबर वह पारंपरिक कक्ष होता है जहां विवाह के बाद नवविवाहित जोड़ा प्रवेश करता है। मधुबनी कला की शुरुआत इसी कोहबर चित्रांकन की परंपरा से मानी जाती है। इन चित्रों में प्रेम, समृद्धि, उर्वरता और सुखी वैवाहिक जीवन के प्रतीक बनाए जाते हैं।

मधुबनी कला का महत्व

आज मधुबनी पेंटिंग केवल बिहार की सांस्कृतिक पहचान नहीं, बल्कि भारत की अमूल्य लोक विरासत का हिस्सा है। यह कला अब कागज, कैनवास, कपड़े, लकड़ी, मिट्टी के बर्तन और हस्तशिल्प उत्पादों पर भी बनाई जाती है। इससे हजारों ग्रामीण महिलाएं स्वरोजगार से जुड़कर आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन रही हैं।

रोचक तथ्य

  • मधुबनी पेंटिंग को मिथिला पेंटिंग भी कहा जाता है।
  • इसकी उत्पत्ति बिहार के मिथिला क्षेत्र में हुई।
  • शुरुआत घरों की दीवारों और आंगनों पर चित्र बनाने की परंपरा से हुई।
  • इसमें प्राकृतिक रंगों का प्रयोग पारंपरिक रूप से किया जाता है।
  • इस कला को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने में सीता देवी सहित कई कलाकारों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है।

Frequently Asked Questions

मधुबनी पेंटिंग क्या है?

मधुबनी पेंटिंग भारत की प्रसिद्ध लोक चित्रकला है, जिसे मिथिला पेंटिंग भी कहा जाता है। इसकी उत्पत्ति बिहार के मिथिला क्षेत्र में हुई और यह अपनी रंगीन, पारंपरिक एवं हस्तनिर्मित शैली के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध है।

मधुबनी पेंटिंग की सबसे बड़ी विशेषता क्या है?

इस कला में प्राकृतिक और चटकीले रंगों, बारीक रेखाओं तथा देवी-देवताओं, प्रकृति, विवाह, सूर्य, मछली, कमल और मिथिला संस्कृति से जुड़े प्रतीकों का चित्रण किया जाता है।

मधुबनी पेंटिंग की शुरुआत कब और कहां हुई?

मधुबनी चित्रकला की शुरुआत बिहार के मिथिला क्षेत्र में हुई। लोक मान्यताओं के अनुसार, राजा जनक ने माता सीता के विवाह के अवसर पर इस कला को प्रोत्साहित किया था, जबकि ऐतिहासिक रूप से इसे मिथिला की महिलाओं की सदियों पुरानी लोक परंपरा माना जाता है।

मधुबनी पेंटिंग को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहचान कैसे मिली?

प्रसिद्ध कलाकार सीता देवी सहित कई लोक कलाकारों ने मधुबनी कला को घरों की दीवारों से कागज और कैनवास तक पहुंचाया। इसके बाद यह कला राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रिय हुई और कई कलाकारों को पद्म पुरस्कारों से सम्मानित किया गया।

मधुबनी पेंटिंग में कौन-कौन से विषय प्रमुख होते हैं?

मधुबनी पेंटिंग में राम-सीता, राधा-कृष्ण, शिव-पार्वती, सूर्य, चंद्रमा, मछली, मोर, कमल, पेड़-पौधे, विवाह संस्कार और मिथिला की सांस्कृतिक परंपराओं को प्रमुखता से दर्शाया जाता है।

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