Ramadan 2026 की शुरुआत भारत में 19 फरवरी से हो चुकी है और मुस्लिम समुदाय रोजा रखकर इबादत कर रहा है। ऐसे में हर दिन सूर्यास्त के बाद इफ्तार के समय सबसे पहले खजूर खाकर रोजा खोलने की परंपरा निभाई जाती है। यह सिर्फ एक धार्मिक रस्म नहीं है, बल्कि इसके पीछे आस्था, परंपरा और स्वास्थ्य से जुड़े महत्वपूर्ण कारण भी हैं।
पैगंबर की सुन्नत से जुड़ी है खजूर की परंपरा
इस्लाम में खजूर से रोजा खोलना पैगंबर हजरत मोहम्मद की सुन्नत माना जाता है। हदीस में बताया गया है कि पैगंबर रोजा खोलते समय ताजा या सूखी खजूर खाते थे और अगर खजूर उपलब्ध न हो तो पानी से रोजा खोलते थे। यही कारण है कि दुनिया भर के मुसलमान आज भी इस परंपरा का पालन करते हैं। खजूर से इफ्तार करना आस्था, सादगी और अल्लाह के प्रति शुक्रगुजारी का प्रतीक माना जाता है।
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तुरंत मिलती है ऊर्जा
दिन भर भूखे-प्यासे रहने के बाद शरीर में ग्लूकोज की कमी हो जाती है। खजूर में प्राकृतिक शुगर जैसे ग्लूकोज और फ्रक्टोज होते हैं, जो शरीर को तुरंत ऊर्जा देते हैं और कमजोरी दूर करते हैं। यही कारण है कि खजूर को इफ्तार के लिए सबसे बेहतर और सुरक्षित फल माना जाता है।
पाचन आसान और सुरक्षित फल
खाली पेट भारी या तली हुई चीजें खाने से पेट पर अचानक दबाव पड़ सकता है। खजूर हल्की और जल्दी पचने वाली होती है, जिससे शरीर धीरे-धीरे भोजन को स्वीकार करता है। यह पाचन तंत्र को सक्रिय करती है और ज्यादा खाने से भी बचाती है।
खजूर खाने से मिलते हैं ये बड़े फायदे
खजूर पोषण से भरपूर फल है और इसमें कई जरूरी तत्व होते हैं, जैसे
- फाइबर, जो पाचन सुधारता है
- पोटैशियम और मैग्नीशियम, जो दिल के लिए फायदेमंद हैं
- आयरन, जो खून की कमी दूर करता है
- एंटीऑक्सीडेंट, जो शरीर को बीमारियों से बचाते हैं
इसके अलावा खजूर शरीर को हाइड्रेट रखने, इम्यून सिस्टम मजबूत करने और कमजोरी दूर करने में मदद करती है।

धार्मिक और वैज्ञानिक दोनों दृष्टि से सही परंपरा
इस्लाम में खजूर को बरकत वाला फल माना गया है और इसे खाने से रोजा खोलना पुण्य का काम माना जाता है। वहीं आधुनिक विज्ञान भी मानता है कि खजूर शरीर को तुरंत ऊर्जा देने, पाचन सुधारने और शरीर को संतुलित रखने में मदद करती है।
खजूर से रोजा खोलना सिर्फ धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि शरीर के लिए भी बेहद फायदेमंद है। यह आस्था और स्वास्थ्य का संतुलित उदाहरण है। यही वजह है कि रमजान में इफ्तार की शुरुआत खजूर से करने की परंपरा आज भी पूरी दुनिया में जारी है।





