लाड़ली बहना योजना पर हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, दोबारा पंजीयन की मांग खारिज – Urjanchal Tiger
Urjanchal Tiger
बुधवार, 19 अगस्त 2026 |

No Live TV Stream Available

Please check back later.

Advertisement
Welcome Gift: 2,000 Reward Points

SBI BPCL Credit Card - Best Card for fuel!

बढ़ते तेल कि कीमत पर बचत !
SBI
Apply Now

लाड़ली बहना योजना पर हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, दोबारा पंजीयन की मांग खारिज

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने लाड़ली बहना योजना में दोबारा रजिस्ट्रेशन और आयु सीमा में बदलाव की मांग वाली जनहित याचिका खारिज कर दी। जानिए कोर्ट ने सरकार के पक्ष में क्या कहा और अब महिलाओं पर क्या असर पड़ेगा।

UTN Hindi ।। Digital Team

Author | Updated: 12 Feb 2026, 03:28 PM IST | 0 min read
Share:
Advertisement

मध्य प्रदेश की बहुचर्चित लाड़ली बहना योजना को लेकर दायर जनहित याचिका पर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने योजना में दोबारा पंजीयन शुरू करने, आयु सीमा में बदलाव और आर्थिक सहायता राशि बढ़ाने की मांग को अस्वीकार करते हुए याचिका खारिज कर दी। अदालत ने साफ कहा कि योजनाओं की पात्रता तय करना सरकार का विशेषाधिकार है और इसमें न्यायालय का हस्तक्षेप सीमित है।

क्या थी याचिका की मांग

रतलाम के पूर्व विधायक और पूर्व महापौर पारस सकलेचा ने हाई कोर्ट में जनहित याचिका दाखिल की थी। इसमें मांग की गई थी कि 20 अगस्त 2023 के बाद 21 वर्ष की आयु पूरी करने वाली महिलाओं को योजना में शामिल करने के लिए दोबारा रजिस्ट्रेशन शुरू किया जाए।

साथ ही, पात्रता की न्यूनतम आयु 21 से घटाकर 18 वर्ष करने और सहायता राशि 1500 रुपये से बढ़ाकर 3000 रुपये करने की भी मांग रखी गई थी। याचिकाकर्ता का तर्क था कि बड़ी संख्या में महिलाएं केवल रजिस्ट्रेशन बंद होने की वजह से लाभ से वंचित हो रही हैं।

New Edition

Read Today's E-Magazine

Swipe through the complete digital edition of Urjanchal Tiger right on your screen.

सरकार ने कोर्ट में क्या कहा

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि किसी भी सामाजिक योजना की पात्रता, रजिस्ट्रेशन प्रक्रिया और आर्थिक सहायता तय करना पूरी तरह शासन का नीतिगत निर्णय है।

Advertisement

सरकार ने यह भी कहा कि अदालत प्रशासनिक और वित्तीय नीतियों में दखल नहीं दे सकती। इस आधार पर याचिका खारिज करने का अनुरोध किया गया।

कोर्ट का स्पष्ट रुख

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद इंदौर खंडपीठ ने कहा कि योजना संबंधी निर्णय लेना सरकार का अधिकार क्षेत्र है। अदालत नीति निर्माण में हस्तक्षेप नहीं कर सकती। इसी आधार पर जनहित याचिका निरस्त कर दी गई।

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यह फैसला भविष्य में भी ऐसी योजनाओं से जुड़े नीतिगत मामलों में न्यायालय के सीमित हस्तक्षेप को दर्शाता है।

ADVERTISEMENT
Advertisement