Shark Tank India के जज और उद्यमी अनुपम मित्तल ने भारत में मासिक वेतन प्रणाली की जगह महीने में दो बार सैलरी देने का सुझाव दिया है। उनका मानना है कि इससे कर्मचारियों की नकदी उपलब्धता बढ़ेगी और उन्हें छोटी-छोटी जरूरतों के लिए कर्ज पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। हालांकि इस प्रस्ताव ने कॉर्पोरेट जगत, एचआर विभागों और फिनटेक उद्योग में नई बहस छेड़ दी है।
महीने में दो बार सैलरी देने की वकालत
उद्यमी और शार्क टैंक इंडिया के चर्चित निवेशक Anupam Mittal ने भारत की पारंपरिक मासिक वेतन प्रणाली में बदलाव का सुझाव दिया है।
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उनका कहना है कि कर्मचारियों को महीने में एक बार वेतन देने के बजाय 15 और 30 तारीख को दो किश्तों में सैलरी दी जानी चाहिए। इससे कर्मचारियों को अपनी दैनिक जरूरतों और खर्चों को बेहतर तरीके से प्रबंधित करने में मदद मिलेगी।
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कर्मचारियों को कैसे होगा फायदा?
विशेषज्ञों के अनुसार वर्तमान वेतन प्रणाली में कई कर्मचारियों को महीने के अंत तक वित्तीय दबाव का सामना करना पड़ता है।
यदि महीने में दो बार वेतन मिले तो:
- नकदी की उपलब्धता बढ़ेगी
- छोटे खर्चों के लिए कर्ज लेने की जरूरत कम होगी
- क्रेडिट कार्ड और पर्सनल लोन पर निर्भरता घट सकती है
- घरेलू बजट का प्रबंधन आसान होगा
- वित्तीय तनाव कम हो सकता है
समर्थकों का मानना है कि इससे आम कर्मचारियों की आर्थिक स्थिति मजबूत हो सकती है।
कंपनियों के सामने आएंगी चुनौतियां
हालांकि इस बदलाव को लागू करना कंपनियों के लिए आसान नहीं होगा।
वर्तमान में अधिकांश कंपनियों के पेरोल सिस्टम मासिक वेतन भुगतान के अनुसार डिजाइन किए गए हैं। टैक्स कटौती, भविष्य निधि (PF), बीमा प्रीमियम और अन्य वैधानिक भुगतान भी मासिक आधार पर होते हैं।
ऐसे में दो बार वेतन देने की व्यवस्था लागू करने के लिए:
- पेरोल सॉफ्टवेयर में बदलाव
- टैक्स कैलकुलेशन सिस्टम का उन्नयन
- अतिरिक्त प्रशासनिक कार्य
- नई अनुपालन प्रक्रियाएं
जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।
फिनटेक और लोन कंपनियों पर पड़ सकता है असर
भारत में तेजी से बढ़ रहे “बाय नाउ, पे लेटर” और माइक्रो-लोन सेक्टर पर भी इस बदलाव का असर पड़ सकता है।
वर्तमान में कई फिनटेक कंपनियां कर्मचारियों को महीने के अंत में नकदी की कमी के दौरान छोटे ऋण उपलब्ध कराती हैं।
यदि लोगों को हर 15 दिन में वेतन मिलने लगे तो ऐसे लोन की मांग घट सकती है, जिससे इन कंपनियों के कारोबार पर प्रभाव पड़ सकता है।
बचत पर भी उठे सवाल
कुछ वित्तीय विशेषज्ञ इस प्रस्ताव को लेकर पूरी तरह सहमत नहीं हैं।
उनका तर्क है कि बार-बार पैसा मिलने पर लोग अधिक खर्च कर सकते हैं, जिससे बचत की आदत प्रभावित हो सकती है।
विशेष रूप से निम्न और मध्यम आय वर्ग के लोगों में अनियोजित खर्च बढ़ने की संभावना जताई जा रही है।
क्या पूरे देश में लागू हो पाएगा मॉडल?
विशेषज्ञों का मानना है कि फिलहाल यह मॉडल बड़े आईटी, टेक्नोलॉजी और सेवा क्षेत्र की कंपनियों में ही आसानी से लागू किया जा सकता है।
सरकार या नियामक संस्थाओं की ओर से अभी तक इस तरह के किसी अनिवार्य बदलाव का संकेत नहीं मिला है। इसलिए इसका भविष्य मुख्य रूप से कंपनियों की स्वैच्छिक पहल पर निर्भर करेगा।





