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8 दिन की अवैध हिरासत पर इलाहाबाद हाईकोर्ट सख्त, यूपी सरकार को ₹2 लाख मुआवजा देने का आदेश

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 8 दिन तक अवैध हिरासत में रखे गए व्यक्ति को ₹2 लाख मुआवजा देने का आदेश दिया है। कोर्ट ने प्रयागराज पुलिस की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल उठाए।

UTN Hindi ।। Digital Team

Author | Updated: 12 Jun 2026, 03:29 PM IST | 1 min read
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 8 दिन तक अवैध हिरासत में रखे गए व्यक्ति को ₹2 लाख मुआवजा देने का आदेश दिया है। कोर्ट ने प्रयागराज पुलिस की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल उठाए।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को एक व्यक्ति को 8 दिन तक अवैध रूप से हिरासत में रखने के मामले में ₹2 लाख मुआवजा देने का निर्देश दिया है। अदालत ने कहा कि पुलिस ने कानून के प्रावधानों का खुला उल्लंघन किया। साथ ही प्रयागराज पुलिस कमिश्नरेट में हिरासत संबंधी मामलों की स्थिति को “चौंकाने वाला” बताया।

8 दिन की अवैध हिरासत पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया है कि वह अवैध रूप से 8 दिन तक हिरासत में रखे गए व्यक्ति को ₹2 लाख का मुआवजा दे। अदालत ने यह भी कहा कि संबंधित पुलिस अधिकारी के खिलाफ विभागीय जांच कर यह राशि उससे वसूली जाए।

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न्यायमूर्ति सिद्धार्थ और न्यायमूर्ति विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने 8 जून को यह आदेश पारित किया।

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क्या है मामला?

याचिकाकर्ता मंसूर अहमद उर्फ लल्लू को 19 मार्च 2026 को पुलिस ने शांति व्यवस्था बनाए रखने और संभावित अपराध रोकने से संबंधित प्रावधानों के तहत हिरासत में लिया था।

परिवार द्वारा हाईकोर्ट में याचिका दायर किए जाने के बाद उन्हें 27 मार्च 2026 को रिहा किया गया।

अदालत ने पाया कि उन्हें भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 170 के तहत हिरासत में रखा गया, जबकि कानून के अनुसार उन्हें 24 घंटे से अधिक समय तक हिरासत में नहीं रखा जा सकता था।

कोर्ट ने क्या कहा?

हाईकोर्ट ने कहा कि 

“याचिकाकर्ता को 8 दिनों तक अवैध हिरासत में रखा गया। इसलिए उन्हें ₹25,000 प्रतिदिन की दर से कुल ₹2 लाख का मुआवजा दिया जाए।”

अदालत ने राज्य सरकार को छह सप्ताह के भीतर भुगतान करने का निर्देश दिया।

ACP की कार्रवाई पर उठाए सवाल

सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि प्रयागराज के सहायक पुलिस आयुक्त (ACP) ने एक प्रिंटेड प्रोफार्मा पर आदेश पारित कर याचिकाकर्ता को सीधे 27 मार्च तक न्यायिक हिरासत में भेज दिया।

कोर्ट ने कहा कि आदेश में कहीं भी यह उल्लेख नहीं था कि याचिकाकर्ता ने शांति बनाए रखने के लिए निजी मुचलका देने से इनकार किया था।

कानून का खुला उल्लंघन

अदालत ने कहा कि BNSS की धारा 170, 126 और 135 के प्रावधानों का स्पष्ट उल्लंघन किया गया।

कोर्ट ने टिप्पणी की

“यदि याचिकाकर्ता 19 मार्च को जमानत या मुचलका नहीं दे पाया था, तो उसे अगले दिन अवसर दिया जा सकता था। लेकिन उसे सीधे 8 दिनों तक हिरासत में रखा गया, जो पूरी तरह अवैध था।”

प्रयागराज पुलिस कमिश्नरेट पर हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी

मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, प्रयागराज द्वारा अदालत को उपलब्ध कराए गए आंकड़ों के अनुसार

  • वर्ष 2024 में 283 लोग
  • वर्ष 2025 में 1321 लोग
  • वर्ष 2026 में 721 लोग

कथित रूप से कानून के विपरीत हिरासत में रखे गए।

इन आंकड़ों पर चिंता जताते हुए हाईकोर्ट ने कहा

“प्रयागराज कमिश्नरेट की स्थिति बेहद चौंकाने वाली है। पुलिस आयुक्त को मजिस्ट्रेट जैसी शक्तियां दी गई हैं, जिनका अत्यधिक दुरुपयोग हो रहा है।”

विभागीय जांच के आदेश

अदालत ने निर्देश दिया कि प्रयागराज के एसीपी (बारा) के खिलाफ तीन महीने के भीतर विभागीय जांच पूरी की जाए और उसके बाद मुआवजे की राशि संबंधित अधिकारी से वसूलने की कार्रवाई की जाए।

कानून क्या कहता है ?

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के तहत किसी भी व्यक्ति को निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बिना लंबे समय तक हिरासत में नहीं रखा जा सकता। संविधान का अनुच्छेद 21 प्रत्येक नागरिक को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार प्रदान करता है। ऐसे मामलों में अदालतें अक्सर मुआवजा और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए हस्तक्षेप करती हैं।

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