अमेरिका की एक रिपोर्ट को लेकर भारत और अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नई बहस छिड़ गई है। इस रिपोर्ट में भारत में धार्मिक स्वतंत्रता की स्थिति पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। खास बात यह है कि इसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) को लेकर भी कई सिफारिशें की गई हैं, जिससे विवाद और बढ़ गया है।
क्या है पूरा मामला?
दरअसल, अमेरिका की संस्था यूनाइटेड स्टेट्स कमीशन ऑन इंटरनेशनल रिलीजियस फ्रीडम (USCIRF) हर साल एक रिपोर्ट जारी करती है। इस रिपोर्ट में दुनिया के अलग-अलग देशों में धार्मिक स्वतंत्रता की स्थिति का आकलन किया जाता है।
Also Read
2025 की रिपोर्ट में भारत को लेकर कहा गया है कि धार्मिक स्वतंत्रता की स्थिति में गिरावट आई है। रिपोर्ट में आरोप लगाया गया है कि कुछ कानूनों का असर अल्पसंख्यक समुदायों पर पड़ा है।
Read Today's E-Magazine
Swipe through the complete digital edition of Urjanchal Tiger right on your screen.
किन कानूनों का किया गया जिक्र?
रिपोर्ट में जिन कानूनों का उल्लेख किया गया है, उनमें शामिल हैं
- नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA)
- गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम (UAPA)
- विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (FCRA)
- राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC)
रिपोर्ट का दावा है कि इन कानूनों का इस्तेमाल कई मामलों में एक्टिविस्ट और अल्पसंख्यक समुदाय से जुड़े लोगों के खिलाफ हुआ है।
सबसे बड़ा विवाद : RSS पर कार्रवाई की सिफारिश
इस रिपोर्ट का सबसे विवादित हिस्सा वह है, जिसमें अमेरिका सरकार से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के खिलाफ कड़े कदम उठाने की बात कही गई है।
रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि
- RSS की संपत्तियों पर कार्रवाई पर विचार किया जाए
- इसके सदस्यों के अमेरिका आने-जाने पर रोक लगाई जाए
क्या सच में हो सकती है ऐसी कार्रवाई ?
विशेषज्ञों के अनुसार, USCIRF केवल सिफारिशें देता है। अंतिम निर्णय अमेरिकी सरकार को लेना होता है।
यानी यह जरूरी नहीं है कि रिपोर्ट में कही गई सभी बातें लागू हों। हालांकि, ऐसी रिपोर्टें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक धारणा (narrative) जरूर बनाती हैं, जिसका असर कूटनीतिक रिश्तों पर पड़ सकता है।
भारत का रुख क्या है?
भारत सरकार पहले भी ऐसे आरोपों को खारिज करती रही है। भारत का साफ कहना है कि ये उसके आंतरिक मामले हैं और किसी बाहरी देश को इसमें हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है।
- अमेरिका की इस रिपोर्ट ने एक बार फिर भारत-अमेरिका संबंधों और आंतरिक नीतियों को लेकर बहस छेड़ दी है। फिलहाल यह देखना अहम होगा कि क्या अमेरिकी सरकार इन सिफारिशों पर कोई ठोस कदम उठाती है या मामला सिर्फ रिपोर्ट तक ही सीमित रहता है।



