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अमेरिका से भारत को मिली सांस्कृतिक विरासत की बड़ी जीत

अमेरिका के स्मिथसोनियन ने भारत को नटराज, सोमस्कंद और संत सुंदरर की ऐतिहासिक मूर्तियां लौटाने का ऐलान किया। जानिए क्यों लिया गया यह फैसला और भारत को क्या मिली बड़ी कूटनीतिक सफलता।

अजीत नारायण सिंह

Author | Updated: 30 Jan 2026, 07:20 PM IST | 1 min read
Smithsonian returns Indian sculptures
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वॉशिंगटन स्थित स्मिथसोनियन नेशनल म्यूज़ियम ऑफ एशियन आर्ट ने बुधवार (28 जनवरी 2026) को एक अहम घोषणा करते हुए कहा कि वह भारत को तीन प्राचीन मूर्तियां लौटाएगा। इनमें भगवान नटराज, सोमस्कंद, और संत सुंदरर विद पारावई की दुर्लभ प्रतिमाएं शामिल हैं।

यह फैसला एक विस्तृत और कठोर प्रोवेनेंस रिसर्च (Provenance Research) के बाद लिया गया, जिसमें यह स्पष्ट हुआ कि ये मूर्तियां अवैध तरीके से भारत के मंदिरों से निकाली गई थीं।

जांच में हुआ खुलासा, अवैध तस्करी से पहुंची थीं विदेश

स्मिथसोनियन संग्रहालय की ओर से बताया गया कि वर्षों की रिसर्च और दस्तावेज़ी जांच के बाद यह प्रमाणित हुआ कि ये मूर्तियां वैध रूप से निर्यात नहीं की गई थीं।

विशेषज्ञों के अनुसार, ये प्रतिमाएं दक्षिण भारत के प्राचीन मंदिरों से चोरी कर अंतरराष्ट्रीय कला बाजार के ज़रिये अमेरिका तक पहुंचाई गई थीं।

इस खुलासे के बाद संग्रहालय प्रशासन ने भारत सरकार से संपर्क कर मूर्तियां लौटाने का निर्णय लिया।

भारत-अमेरिका सांस्कृतिक संबंधों को मिलेगा नया बल

भारत सरकार ने इस निर्णय का स्वागत करते हुए इसे सांस्कृतिक धरोहर की वापसी की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम बताया है।

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हालांकि, दोनों देशों के बीच आपसी सहमति से यह तय हुआ है कि तीन में से एक मूर्ति को लंबी अवधि के लिए स्मिथसोनियन म्यूज़ियम में प्रदर्शित किया जाएगा, ताकि विश्व समुदाय भारतीय कला और परंपरा को करीब से देख सके।

नटराज और सोमस्कंद का धार्मिक महत्व

  • नटराज भगवान शिव के तांडव स्वरूप का प्रतीक हैं, जो सृष्टि, संरक्षण और विनाश के संतुलन को दर्शाते हैं।
  • सोमस्कंद प्रतिमा भगवान शिव, माता पार्वती और भगवान कार्तिकेय के पारिवारिक स्वरूप को दर्शाती है।
  • संत सुंदरर तमिल भक्ति आंदोलन के प्रमुख संत माने जाते हैं, जिनकी प्रतिमा ऐतिहासिक और धार्मिक दृष्टि से अत्यंत मूल्यवान है।

भारत की बड़ी कूटनीतिक सफलता

पिछले कुछ वर्षों में भारत ने अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और यूरोपीय देशों से सैकड़ों प्राचीन धरोहरें वापस हासिल की हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम न सिर्फ सांस्कृतिक न्याय है, बल्कि भारत की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ती कूटनीतिक प्रभावशीलता को भी दर्शाता है।

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