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लखनऊ की चिकनकारी : नवाबी विरासत से ग्लोबल फैशन तक का सफर

लखनऊ की प्रसिद्ध चिकनकारी कला का इतिहास, महत्व और आज की स्थिति जानिए इस विशेष रिपोर्ट में।

Shabana Parveen

Editor | Updated: 26 Mar 2026, 09:27 AM IST | 1 min read
लखनऊ की चिकनकारी : नवाबी विरासत से ग्लोबल फैशन तक का सफर
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उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ केवल अपनी तहज़ीब और अदब के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी अनूठी चिकनकारी कला के लिए भी विश्वभर में प्रसिद्ध है। सदियों पुरानी यह कढ़ाई आज भी न केवल स्थानीय कारीगरों की पहचान है, बल्कि भारत की सांस्कृतिक विरासत का अहम हिस्सा बनी हुई है।

क्या है चिकनकारी कला

चिकनकारी एक पारंपरिक हाथ से की जाने वाली कढ़ाई है, जो मुख्य रूप से सफेद धागों से महीन कपड़ों पर की जाती है। इसमें फूल-पत्तियों और जालीदार डिजाइनों का विशेष महत्व होता है।

नवाबी दौर से शुरू हुई परंपरा

इतिहासकारों के अनुसार, चिकनकारी का विकास मुगल काल में हुआ और इसे नवाबों के दौर में खास पहचान मिली। कहा जाता है कि नूरजहाँ ने इस कला को बढ़ावा दिया था।

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लखनऊ की चिकनकारी : नवाबी विरासत से ग्लोबल फैशन तक का सफर

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आज का बदलता स्वरूप

समय के साथ चिकनकारी ने आधुनिक फैशन में भी अपनी जगह बना ली है। अब यह केवल कुर्ता या साड़ी तक सीमित नहीं रही, बल्कि वेस्टर्न आउटफिट, डिजाइनर ड्रेसेस और एक्सेसरीज़ में भी इस्तेमाल हो रही है।

लखनऊ और आसपास के क्षेत्रों में हजारों परिवार आज भी चिकनकारी पर निर्भर हैं। यह कला खासकर महिलाओं को घर बैठे रोजगार देने का एक बड़ा माध्यम बनी हुई है।

हालांकि, मशीन से बनने वाले सस्ते उत्पादों के कारण पारंपरिक कारीगरों को आर्थिक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। इसके बावजूद असली हस्तनिर्मित चिकनकारी की मांग देश-विदेश में बनी हुई है।

लखनऊ की चिकनकारी केवल एक कढ़ाई नहीं, बल्कि सदियों पुरानी संस्कृति और मेहनत की जीवित मिसाल है। बदलते दौर में भी इसकी चमक बरकरार है, जो इसे भारत की पहचान बनाती है।

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