₹999 में दोस्ती ! अकेलेपन का बढ़ता कारोबार और बदलती युवा पीढ़ी की प्राथमिकताएं

भारत में तेजी से बढ़ते “Loneliness Economy” के बीच युवा अब दोस्ती और सामाजिक जुड़ाव के लिए पैसे खर्च कर रहे हैं। रनिंग क्लब, बुक क्लब, नेटवर्किंग इवेंट्स और वर्कशॉप्स जैसी गतिविधियां अब सिर्फ शौक नहीं, बल्कि ‘belonging’ का माध्यम बन चुकी हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह बदलाव समाज में घटते पारंपरिक सामुदायिक ढांचे का संकेत है और आने वाले समय में यह एक बड़ा उपभोक्ता ट्रेंड बन सकता है।

Neeraj Sahu

Author | Updated: 13 Aug 2026, 11:12 AM IST | 1 min read
Friendship for ₹999
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भारत में एक नया ट्रेंड तेजी से उभर रहा है, जहां लोग अब दोस्ती और सामाजिक जुड़ाव के लिए पैसे खर्च करने को तैयार हैं। पहले जहां दोस्ती कॉलेज, ऑफिस या मोहल्ले में स्वतः बन जाती थी, वहीं अब इसके लिए विशेष प्लेटफॉर्म और इवेंट्स सामने आ रहे हैं।

₹500 से ₹2000 तक की फीस देकर लोग रनिंग क्लब, नेटवर्किंग मीटअप, बुक क्लब या वर्कशॉप्स में शामिल हो रहे हैं। इन आयोजनों का उद्देश्य केवल गतिविधि नहीं, बल्कि समान विचारधारा वाले लोगों के बीच जुड़ाव बनाना है।

कहां खर्च कर रहे हैं युवा?

आज के युवा जिन गतिविधियों पर पैसा खर्च कर रहे हैं, उनमें शामिल हैं:

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  • रनिंग और फिटनेस क्लब
  • हाई-इंटेंसिटी ट्रेनिंग कम्युनिटी (जैसे Hyrox)
  • पॉटरी और आर्ट वर्कशॉप
  • सप्पर क्लब (डिनर मीटअप)
  • बुक क्लब और चर्चा समूह
  • प्रोफेशनल नेटवर्किंग इवेंट्स

इन सभी प्लेटफॉर्म्स का मूल उद्देश्य एक ही है, लोगों को जोड़ना और उन्हें एक समुदाय का हिस्सा महसूस कराना।

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गतिविधि नहीं, ‘Belonging’ की बिक्री

विशेषज्ञों का मानना है कि ये सेवाएं केवल गतिविधियां नहीं बेच रही हैं, बल्कि “Belonging” यानी अपनापन बेच रही हैं।

  • लोग सिर्फ दौड़ने या पढ़ने के लिए नहीं जुड़ रहे
  • वे ऐसे लोगों से मिलना चाहते हैं जिनकी सोच और रुचियां समान हों
  • यह भावनात्मक और सामाजिक जरूरतों को पूरा करने का माध्यम बन चुका है

क्यों बढ़ रहा है यह ट्रेंड?

1. पारंपरिक सामाजिक ढांचे में बदलाव

पहले संयुक्त परिवार, पड़ोस और ऑफिस में ही सामाजिक दायरा बन जाता था। अब यह ढांचा कमजोर हो रहा है।

2. शहरी जीवनशैली 

बड़े शहरों में लोग अधिक व्यस्त और अलग-थलग हो गए हैं, जिससे अकेलेपन की भावना बढ़ी है।

3. डिजिटल युग का प्रभाव

सोशल मीडिया के बावजूद वास्तविक जुड़ाव कम होता जा रहा है, जिससे लोग ऑफलाइन कनेक्शन की तलाश कर रहे हैं।

क्या लोग इसके लिए भुगतान करने को तैयार हैं?

हाल के रुझानों से संकेत मिलता है कि युवा ₹500 से ₹2000 तक खर्च करने को तैयार हैं, यदि उन्हें:

  • समान विचारधारा वाले लोग मिलें
  • नए दोस्त बनाने का अवसर मिले
  • मानसिक और सामाजिक संतुलन बेहतर हो

यह दर्शाता है कि अकेलेपन को कम करने के लिए लोग अब इसे एक निवेश के रूप में देख रहे हैं।

भारत में पारंपरिक रूप से सामाजिक जुड़ाव परिवार, शिक्षा संस्थानों और कार्यस्थलों के माध्यम से सहज रूप से बनता था। लेकिन शहरीकरण, बदलती जीवनशैली और न्यूक्लियर फैमिली सिस्टम के कारण यह संरचना कमजोर हुई है। इसी के चलते “Loneliness Economy” या “अकेलेपन का बाजार” उभर रहा है, जहां कंपनियां और स्टार्टअप्स सामाजिक जुड़ाव को एक सेवा के रूप में पेश कर रहे हैं।

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