हसमुखभाई पारेख का जन्म 10 मार्च 1911 को गुजरात के सूरत में हुआ था। आर्थिक तंगी के कारण उन्होंने दिन में पढ़ाई और रात में काम किया।उनकी मेहनत रंग लाई और उन्हें लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में स्कॉलरशिप मिली। वहीं से उन्होंने फाइनेंस की गहरी समझ हासिल की।
करियर की शुरुआत : टीचिंग से कॉर्पोरेट तक
भारत लौटने के बाद उन्होंने मुंबई के एक कॉलेज में इकोनॉमिक्स पढ़ाया, लेकिन जल्द ही कॉर्पोरेट सेक्टर की ओर रुख किया।स्टॉक ब्रोकिंग फर्म में काम करते हुए उन्होंने वित्तीय बाजार की बारीकियां सीखी। इसके बाद 1956 में उन्होंने ICICI लिमिटेड ज्वाइन किया और शानदार काम किया।
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आम लोगों के लिए लोन लेना किया आसान
ICICI में काम करते हुए उन्हें यह महसूस हुआ कि बैंकिंग सिस्टम सिर्फ अमीरों और बिजनेसमैन तक सीमित है।गरीब और मिडिल क्लास के लोगों के लिए घर बनाने का कोई आसान विकल्प नहीं था। यही सोच आगे चलकर उनकी सबसे बड़ी पहचान बनी।
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रिटायरमेंट के बाद लिया बड़ा फैसला
1976 में रिटायर होने के बाद हसमुखभाई पारेख ने भारत में होम लोन का कॉन्सेप्ट शुरू करने की योजना बनाई। उन्होंने तत्कालीन वित्त सचिव डॉ. मनमोहन सिंह से मुलाकात की। शुरुआती संदेह के बावजूद उन्होंने 1977 में HDFC लिमिटेड की स्थापना कर दी।
दीपक पारेख को सौंपी कमान
HDFC की शुरुआत के बाद उन्होंने अपने भतीजे दीपक पारेख को विदेश से बुलाया और कंपनी की जिम्मेदारी सौंपी।दीपक पारेख के नेतृत्व में HDFC ने तेजी से ग्रोथ की और एक मजबूत वित्तीय संस्था बन गई।
HDFC Bank की शुरुआत : बड़ा टर्निंग पॉइंट
1991 के आर्थिक सुधार (LPG) के बाद प्राइवेट सेक्टर को बैंकिंग लाइसेंस मिलने का रास्ता खुला।1994 में RBI से मंजूरी मिलने के बाद 1995 में HDFC Bank की शुरुआत हुई। मुंबई के वर्ली में पहला ऑफिस खोला गया, जिसका उद्घाटन डॉ. मनमोहन सिंह ने किया।
IPO ने मचाया धमाल
मार्च 1995 में HDFC Bank का IPO लॉन्च हुआ, जिसे 55 गुना ओवरसब्सक्रिप्शन मिला।सिर्फ दो महीने में ही शेयर 300% प्रीमियम पर ट्रेड करने लगे, यह उस समय की बड़ी सफलता थी।
2023 में ऐतिहासिक मर्जर
1 जुलाई 2023 को HDFC Ltd और HDFC Bank का विलय हो गया।इस मर्जर के बाद HDFC Bank दुनिया के सबसे बड़े और वैल्यूएबल बैंकों में शामिल हो गया। वर्तमान में इसका मार्केट कैप ₹12 लाख करोड़ से ज्यादा है।
अपना घर का सपना हुआ आसान
HDFC की शुरुआत ने भारत में होम लोन को आम लोगों तक पहुंचाया।आज मिडिल क्लास परिवार भी आसानी से अपना घर खरीद पा रहे हैं। छोटे शहरों जैसे सिंगरौली और आसपास के क्षेत्रों में भी इसका बड़ा प्रभाव देखा जा रहा है।
एक सोच जिसने बदल दिया बैंकिंग सिस्टम
हसमुखभाई पारेख का निधन 18 नवंबर 1994 को हुआ, लेकिन उनकी सोच आज भी जिंदा है।उनकी दूरदर्शिता ने भारत में हाउसिंग फाइनेंस और बैंकिंग सेक्टर को नई दिशा दी।





