भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में मौलाना मोहम्मद अली जौहर का नाम सम्मान के साथ लिया जाता है। वे एक कुशल पत्रकार, प्रभावशाली वक्ता, प्रखर राष्ट्रवादी नेता, शिक्षाविद और उर्दू के प्रसिद्ध शायर थे। उन्होंने ब्रिटिश शासन के खिलाफ खुलकर आवाज उठाई और अपने जीवन का बड़ा हिस्सा जेल में बिताया।
भारत की जंग-ए-आज़ादी की तारीख़ में मौलाना मोहम्मद अली जौहर का नाम बड़ी अज़मत और एहतराम के साथ लिया जाता है। वह एक बेबाक सहाफ़ी, पुरअसर ख़तीब, जाँबाज़ क़ौमी रहनुमा, मुमताज़ तालीमदान और उर्दू अदब के मशहूर शायर थे। उन्होंने अंग्रेज़ी हुकूमत के ख़िलाफ़ बेख़ौफ़ आवाज़ बुलंद की और मुल्क की आज़ादी की जद्दोजहद में अपनी ज़िंदगी का बड़ा हिस्सा क़ैद-ओ-बंद की सख़्तियाँ बर्दाश्त करते हुए गुज़ारा।
मौलाना मोहम्मद अली जौहर Biography
- पूरा नाम: मौलाना मोहम्मद अली
- तखल्लुस (Pen Name): जौहर
- जन्म: 10 दिसंबर 1878
- जन्मस्थान: रामपुर, उत्तर प्रदेश
- पिता: अब्दुल अली खान
- निधन: 4 जनवरी 1931
- स्थान: लंदन, यूनाइटेड किंगडम
मोहम्मद अली जौहर के पिता का निधन तब हो गया था जब वे केवल दो वर्ष के थे। उनकी प्रारंभिक शिक्षा उनकी माता के मार्गदर्शन में हुई। उन्होंने रामपुर और बरेली में शिक्षा प्राप्त की तथा बाद में अलीगढ़ से उत्कृष्ट अंकों के साथ स्नातक की डिग्री हासिल की।
उनकी प्रतिभा से प्रभावित होकर उनके बड़े भाई मौलाना शौकत अली ने उन्हें उच्च शिक्षा के लिए इंग्लैंड के ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय भेजा, जहाँ उन्होंने इतिहास और कानून का अध्ययन किया।
Mohammad Ali Jauhar : प्रशासनिक सेवा से पत्रकारिता तक
1899 में भारत लौटने के बाद उन्होंने कुछ समय तक रामपुर और बड़ौदा रियासत में कार्य किया। बाद में वे कोलकाता चले गए और अंग्रेज़ी साप्ताहिक The Comrade की शुरुआत की।
इसके बाद उन्होंने उर्दू दैनिक हमदर्द (Hamdard) प्रकाशित किया, जो ब्रिटिश सरकार की नीतियों की खुलकर आलोचना करता था। उनकी निर्भीक पत्रकारिता के कारण उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा।
Mohammad Ali Jauhar : स्वतंत्रता आंदोलन में भूमिका
मौलाना मोहम्मद अली जौहर भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख नेताओं में शामिल थे।
उन्होंने
- 1919 में खिलाफत आंदोलन का नेतृत्व किया।
- महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन में सक्रिय भागीदारी निभाई।
- गांधीजी के साथ मिलकर जामिया मिल्लिया इस्लामिया की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के सक्रिय सदस्य रहे।
सन् 1923 में जेल से रिहा होने के बाद उन्हें भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अध्यक्ष चुना गया। उन्होंने हिंदू-मुस्लिम एकता को मजबूत करने का निरंतर प्रयास किया।
गोलमेज सम्मेलन में Mohammad Ali Jauhar का ऐतिहासिक भाषण
1930 में मौलाना मोहम्मद अली जौहर गोलमेज सम्मेलन (Round Table Conference) में भाग लेने इंग्लैंड गए।
गंभीर रूप से अस्वस्थ होने के बावजूद उन्होंने ब्रिटिश सरकार के सामने भारत की स्वतंत्रता का जोरदार पक्ष रखा। उनका भाषण भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास के सबसे प्रभावशाली भाषणों में गिना जाता है।
साहित्य और शायरी में Mohammad Ali Jauhar का Contribution
मौलाना जौहर केवल राजनेता ही नहीं बल्कि उर्दू साहित्य के प्रतिष्ठित शायर भी थे।
रामपुर के साहित्यिक वातावरण और प्रसिद्ध शायर दाग़ देहलवी की संगत ने उनकी शायरी को नई ऊंचाइयाँ दीं। दाग़ उनकी प्रतिभा से इतने प्रभावित थे कि अक्सर उन्हें अपनी महफिलों में बुलाया करते थे।
उनका प्रसिद्ध शेर आज भी लोगों की जुबान पर है
हर सीना आह है तेरे पैकाँ का मुंतज़िर,
हो इंतिख़ाब ऐ निगाह-ए-यार देख कर।
उनकी रचनाओं का संग्रह “कलाम-ए-जौहर” के नाम से प्रकाशित हुआ।
4 जनवरी 1931 को दुनिया से Mohammad Ali Jauhar हुए रुख़्सत
4 जनवरी 1931 को लंदन में उनका निधन हो गया। उनकी इच्छा के अनुसार उन्हें भारत में नहीं बल्कि यरुशलम (Jerusalem) स्थित अल-अक्सा मस्जिद परिसर में दफनाया गया, जो उनके व्यक्तित्व और संघर्ष की ऐतिहासिक पहचान बन गया।

