वर्ष 2023 के मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में दतिया सीट से हार के बाद पूर्व गृह मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा ने शायराना अंदाज़ में अपनी वापसी का संदेश दिया था। इसे उनकी राजनीतिक विदाई नहीं, बल्कि वापसी के ऐलान के रूप में देखा गया।
“समन्दर का ज्वार उतर गया है, ये सोचकर साहिल पर घर मत बना लेना। मैं वादा करता हूं, लौटकर जरूर आऊंगा।”
करीब तीन साल बाद दतिया उपचुनाव में नरोत्तम मिश्रा ने क्षेत्र में सक्रियता बढ़ाई, कार्यकर्ताओं से मुलाकात की, जनसभाएं कीं और कथित तौर पर अपनी पिछली गलतियों को स्वीकार करते हुए, मतदाताओं से दोबारा संवाद स्थापित करने की कोशिश की। उपचुनाव की घोषणा के बाद उन्होंने नामांकन पत्र भी खरीद लिया।
लेकिन आखिरी वक्त में नरोत्तम मिश्रा की उम्मीदों पर पानी फिर गया। भाजपा ने बड़ा राजनीतिक दांव खेलते हुए नरोत्तम मिश्रा की जगह पूर्व संभागीय संगठन मंत्री और RSS पृष्ठभूमि वाले आशुतोष तिवारी को उम्मीदवार घोषित कर दिया।
भाजपा के इस एक फैसले ने न केवल नरोत्तम मिश्रा की बहुप्रतीक्षित चुनावी वापसी पर विराम लगा दिया, बल्कि दतिया भाजपा के भीतर ऐसा असंतोष मचा कि सड़कों तक पहुंच गया।
दतिया में बगावत, सड़कों पर उतरे समर्थक
आशुतोष तिवारी के नाम की घोषणा होते ही नरोत्तम मिश्रा के समर्थकों का गुस्सा फूट पड़ा और सड़कों पर उतर आए। एक तरफ महिलाओं ने सड़क पर लेटकर विरोध जताया तो वहीं कई पदाधिकारियों ने इस्तीफे तक की घोषणा की। भाजपा प्रत्याशी आशुतोष तिवारी के खिलाफ नारे लगाए गए।
विरोध प्रदर्शन के दौरान ग्वालियर-झांसी हाईवे को बाधित किया गया और कथित तौर पर पथराव की स्थिति भी पैदा हो गई जिसके बाद पुलिस कार्रवाई तक पहुंच गई। यह राजनीतिक विवाद भाजपा के लिए कानून-व्यवस्था और पार्टी अनुशासन की बड़ी चुनौती बन गया।
भाजपा में नरोत्तम मिश्रा की भूमिका
भाजपा ने 2023 के विधानसभा चुनाव में हार के बावजूद नरोत्तम मिश्रा को महत्वपूर्ण संगठनात्मक जिम्मेदारी दी थी। 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा ने कांग्रेस और अन्य दलों के नेताओं-कार्यकर्ताओं को पार्टी में शामिल करने के लिए बड़ा अभियान चलाया था जिसकी जिम्मेदारी नरोत्तम मिश्रा को सौंपी गई थी।
जिसके बाद अप्रैल 2024 में नरोत्तम मिश्रा ने यह दावा किया था कि एक ही दिन में करीब 1.26 लाख और तीन महीनों के दौरान 2.58 लाख से अधिक लोगों ने पार्टी की सदस्यता ली, जिनमें बड़ी संख्या कांग्रेस से आने वाले नेताओं और कार्यकर्ताओं की थी।
भाजपा के उस अभियान जिसका उद्देश्य विपक्ष को कमजोर करना और भाजपा के संगठनात्मक आधार का विस्तार करना था, नरोत्तम मिश्रा उसका प्रमुख चेहरा बने।
लेकिन अब सवाल यह है कि जिस नेता को लाखों नए लोगों के लिए भाजपा के दरवाजे खोले, उसे अपनी परंपरागत दतिया सीट से चुनाव लड़ने का टिकट क्यों नहीं मिला? यही विरोधाभास इस पूरे घटनाक्रम को बड़ा राजनीतिक मुद्दा बना रहा है।
क्या सत्ता समीकरणों ने रोका रास्ता?
शिवराज सिंह चौहान सरकार में गृह मंत्री रहते हुए वह मध्य प्रदेश की सत्ता के सबसे प्रभावशाली नेताओं में शामिल थे और एक समय उन्हें सरकार में नंबर दो की स्थिति वाला नेता माना जाता था।
ऐसे में यदि नरोत्तम मिश्रा दतिया उपचुनाव लड़ते और जीत जाते, तो उनकी कैबिनेट में वापसी की अटकलें तेज होना लगभग तय माना जाता। इसके बाद सवाल उठते कि उन्हें कौन सा विभाग मिलेगा और उनकी वापसी मुख्यमंत्री मोहन यादव सरकार के मौजूदा शक्ति संतुलन को किस तरह प्रभावित करेगी।
कुछ राजनीतिक विश्लेषक यह संभावना जता रहे हैं कि केंद्रीय नेतृत्व भोपाल की सत्ता में एक और मजबूत एवं स्वतंत्र शक्ति केंद्र नहीं चाहता हो। हालांकि भाजपा ने टिकट के फैसले के पीछे ऐसी किसी वजह की आधिकारिक पुष्टि नहीं की है।
ब्राह्मण वोटों का समीकरण बरकरार
दतिया विधानसभा क्षेत्र में ब्राह्मण मतदाताओं को महत्वपूर्ण माना जाता है, इसलिए भाजपा ने नरोत्तम मिश्रा का टिकट काटने के बावजूद ब्राह्मण चेहरे पर ही भरोसा जताया। आशुतोष तिवारी आरएसएस पृष्ठभूमि से आते हैं और लंबे समय से संगठन में काम करने वाले नेता के रूप में जाने जाते हैं।
यह इस बात का संकेत है कि पार्टी ने सामाजिक समीकरण में बड़ा बदलाव करने के बजाय एक मजबूत संगठनात्मक और संघ पृष्ठभूमि वाले नए ब्राह्मण चेहरे को आगे बढ़ाने का फैसला किया।
प्रत्याशी नहीं बदलेगी भाजपा?
नरोत्तम समर्थकों के विरोध के बीच मुख्यमंत्री मोहन यादव ने सार्वजनिक रूप से आशुतोष तिवारी को बधाई देते हुए उनकी जीत की अग्रिम शुभकामनाएं दीं।
इस संदेश की टाइमिंग राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मानी जा रही है। जब विरोध, इस्तीफों और प्रदर्शनों के बीच यह चर्चा चल रही थी कि क्या भाजपा अपने फैसले पर पुनर्विचार कर सकती है, तब मुख्यमंत्री का सार्वजनिक समर्थन इस बात का स्पष्ट संकेत माना गया कि पार्टी नेतृत्व घोषित उम्मीदवार के साथ मजबूती से खड़ा है।
क्यों अहम है दतिया उपचुनाव?
आशुतोष तिवारी के उम्मीदवार बनने के बाद जीत की जिम्मेदारी काफी हद तक प्रदेश सरकार और भाजपा संगठन पर आ गई है। अगर भाजपा जीतती है, तो नेतृत्व यह संदेश दे सकेगा कि पार्टी का चुनाव चिह्न और संगठन किसी भी व्यक्तिगत नेता से बड़ा है।
लेकिन अगर भाजपा यह उपचुनाव हार जाती है, तो यह सवाल उठना तय है कि क्या पार्टी ने आंतरिक सत्ता समीकरणों को साधने के लिए एक मजबूत और संभावित रूप से जिताऊ उम्मीदवार को दरकिनार कर दिया?
यही वजह है कि दतिया उपचुनाव अब महज एक विधानसभा सीट की लड़ाई न होकर यह भाजपा के संगठनात्मक अनुशासन, मोहन यादव सरकार के राजनीतिक प्रभाव और नरोत्तम मिश्रा के भविष्य तीनों की परीक्षा बन गया है।
क्या होगा नरोत्तम मिश्रा का राजनीतिक भविष्य?
दतिया उपचुनाव में नरोत्तम मिश्रा की चुनावी वापसी का रास्ता फिलहाल बंद हो गया है। लेकिन राजनीति में एक चुनाव या एक टिकट किसी नेता की पूरी कहानी तय नहीं करता। अब असली सवाल यह है, किनरोत्तम मिश्रा की अगली राजनीतिक चाल क्या होगी?





















