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पश्चिम एशिया संकट पर पीएम मोदी की अहम बैठक, तेल-गैस आपूर्ति और सुरक्षा पर फोकस

पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच पीएम मोदी ने राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ बैठक कर ऊर्जा सुरक्षा, तेल-गैस आपूर्ति और आर्थिक प्रभावों की समीक्षा की। जानिए पूरी खबर।

ब्यूरो कार्यालय

Author | Updated: 27 Mar 2026, 09:57 AM IST | 1 min read
पश्चिम एशिया संकट पर पीएम मोदी की अहम बैठक, तेल-गैस आपूर्ति और सुरक्षा पर फोकस
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पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज देश के सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ एक महत्वपूर्ण बैठक की। इस बैठक का मुख्य उद्देश्य भारत की ऊर्जा सुरक्षा, तेल और गैस आपूर्ति की स्थिति तथा आपातकालीन तैयारियों की समीक्षा करना है।

सरकारी सूत्रों के अनुसार यह बैठक वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से आयोजित की गई, जिसमें चुनावी राज्यों को छोड़कर अन्य राज्यों के मुख्यमंत्री शामिल हुए। बैठक में “टीम इंडिया” के तहत केंद्र और राज्यों के बीच समन्वय को मजबूत करने पर विशेष जोर दिया गया।

ऊर्जा आपूर्ति और वैश्विक संकट पर चर्चा

पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष, विशेष रूप से ईरान और इजराइल के बीच बढ़ते तनाव ने वैश्विक तेल और गैस बाजार को प्रभावित किया है। यह क्षेत्र भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि देश अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारत अपनी कुल कच्चे तेल की आवश्यकता का 40% से अधिक हिस्सा पहले पश्चिम एशिया से आयात करता रहा है। हालांकि हाल के वर्षों में भारत ने अपने ऊर्जा स्रोतों को विविध बनाते हुए अब 40 से अधिक देशों से आयात शुरू किया है।

बैठक में आपूर्ति श्रृंखला (सप्लाई चेन), लॉजिस्टिक्स और संभावित बाधाओं पर भी चर्चा की गई। विशेष रूप से होरमुज जलडमरूमध्य में उत्पन्न स्थिति को लेकर चिंता जताई गई, क्योंकि यह मार्ग वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का प्रमुख केंद्र है।

60 दिनों का तेल भंडार

सरकार ने भरोसा दिलाया है कि देश के पास फिलहाल पर्याप्त ऊर्जा भंडार मौजूद है। ताजा आंकड़ों के अनुसार भारत ने लगभग 60 दिनों की कच्चे तेल की आपूर्ति सुनिश्चित कर ली है, जिससे तत्काल संकट की स्थिति से निपटा जा सकता है।

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इसके अलावा भारत के पास 5.3 मिलियन मीट्रिक टन से अधिक का रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार भी मौजूद है, जिसे भविष्य में और बढ़ाने की योजना है।

सरकार ने एलपीजी आपूर्ति को लेकर भी कदम उठाए हैं। पश्चिम एशिया पर निर्भरता कम करने के लिए अमेरिका, रूस और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों से अतिरिक्त गैस आपूर्ति सुनिश्चित की जा रही है।

आर्थिक प्रभाव और चुनौतियां

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह संकट लंबा खिंचता है तो इसका सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। तेल की कीमतों में बढ़ोतरी से महंगाई बढ़ सकती है और परिवहन, उद्योग तथा कृषि क्षेत्र प्रभावित हो सकते हैं।

वैश्विक स्तर पर भी इस संघर्ष ने बड़ा असर डाला है। रिपोर्ट्स के अनुसार तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच चुकी हैं, जिससे कई देशों में आर्थिक दबाव बढ़ा है।

भारत में भी गैस आपूर्ति को लेकर कुछ स्थानों पर परेशानी देखी गई है, जहां वाणिज्यिक उपयोग के लिए एलपीजी की कमी की खबरें सामने आई हैं।

सरकार का रुख

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहले भी इस संकट को “चिंताजनक” बताते हुए कहा था कि सरकार स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए है और देशहित सर्वोपरि है।

भारत ने इस पूरे मामले में संतुलित कूटनीतिक रुख अपनाया है और शांति व संवाद का समर्थन किया है। सरकार ने सात सशक्त समूह (Empowered Groups) भी गठित किए हैं, जो ईंधन, उर्वरक, आपूर्ति श्रृंखला और महंगाई जैसे मुद्दों पर रणनीति तैयार कर रहे हैं।

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