मध्य प्रदेश में बिजली उपभोक्ताओं को एक बार फिर महंगाई का झटका लगा है। राज्य विद्युत नियामक आयोग द्वारा वित्त वर्ष 2026-27 के लिए बिजली दरों में औसतन 4.8% की वृद्धि को मंजूरी दी गई है, जो 3 अप्रैल 2026 से लागू होगी।
यह वृद्धि भले ही बिजली कंपनियों द्वारा प्रस्तावित 10.19% वृद्धि से कम है, लेकिन उद्योग जगत का कहना है कि इससे उत्पादन लागत में उल्लेखनीय बढ़ोतरी होगी। बिजली उत्पादन और वितरण कंपनियों ने यह बढ़ोतरी बढ़ती लागत, महंगाई और लगभग ₹6,000 करोड़ से अधिक के राजस्व अंतर को पूरा करने के लिए आवश्यक बताई है।
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उद्योगों पर सीधा असर
औद्योगिक संगठनों के अनुसार, बिजली दरों में वृद्धि का सीधा असर मैन्युफैक्चरिंग और MSME सेक्टर पर पड़ेगा। पहले से ही कच्चे माल और ईंधन की बढ़ती कीमतों से जूझ रहे उद्योगों के लिए यह फैसला अतिरिक्त बोझ साबित होगा।
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विशेषज्ञों का कहना है कि ऊर्जा लागत किसी भी उत्पादन प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा होती है। ऐसे में बिजली महंगी होने से उत्पादों की लागत बढ़ेगी, जिससे घरेलू और अंतरराज्यीय बाजार में प्रतिस्पर्धा कमजोर हो सकती है। औद्योगिक क्षेत्रों का मानना है कि पड़ोसी राज्यों की तुलना में महंगी बिजली से निवेश और उत्पादन दोनों प्रभावित होंगे।

VAT कम करने की मांग तेज
उद्योग संगठनों ने राज्य सरकार से ईंधन पर लगने वाले VAT को कम करने की मांग की है। उनका सुझाव है कि प्राकृतिक गैस और फर्नेस ऑयल पर VAT को वर्तमान लगभग 14% से घटाकर 3-4% किया जाए, ताकि बढ़ी हुई बिजली लागत का कुछ संतुलन हो सके।
MSME पर सबसे अधिक असर
सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग (MSME) इस बढ़ोतरी से सबसे ज्यादा प्रभावित हो सकते हैं। सीमित मार्जिन और कम पूंजी के कारण इनके लिए लागत में मामूली वृद्धि भी व्यवसाय की स्थिरता पर असर डाल सकती है। देश के अन्य राज्यों में भी इसी तरह के टैरिफ बढ़ोतरी पर उद्योगों ने चिंता जताई है, जहां इसे रोजगार और उत्पादन दोनों के लिए खतरा बताया गया है।
ऊर्जा क्षेत्र का व्यापक परिप्रेक्ष्य
भारत में बिजली की मांग आने वाले वर्षों में तेजी से बढ़ने का अनुमान है, जहां 2030 तक औसतन 6.4% वार्षिक वृद्धि की संभावना जताई गई है। ऐसे में लागत और मांग के बीच संतुलन बनाना सरकारों और नियामकों के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है।



