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NEET Protest पर Facial Recognition का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, राज्यसभा सांसद ए.ए. रहीम ने दायर की याचिका

ब्यूरो कार्यालय

Author | Updated: 29 Jul 2026, 08:41 AM IST | 1 min read
NEET Protest पर Facial Recognition का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, राज्यसभा सांसद ए.ए. रहीम ने दायर की याचिका
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नई दिल्ली। राज्यसभा सांसद ए.ए. रहीम ने मंगलवार (28 जुलाई 2026) को सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर कर NEET-UG परीक्षा पेपर लीक से जुड़े प्रदर्शनकारियों पर कथित तौर पर फेशियल रिकॉग्निशन तकनीक और अन्य व्यापक निगरानी उपायों के इस्तेमाल को चुनौती दी है।

याचिका में अदालत से मांग की गई है कि दिल्ली पुलिस द्वारा शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर बिना स्पष्ट वैधानिक आधार के फेशियल रिकॉग्निशन और अन्य बायोमेट्रिक निगरानी तकनीकों का उपयोग तत्काल रोका जाए तथा इसे असंवैधानिक घोषित किया जाए।

याचिका में क्या कहा गया है?

अधिवक्ता सुभाष चंद्रन के माध्यम से दायर याचिका में आरोप लगाया गया है कि प्रदर्शन शुरू होने के बाद से हजारों प्रदर्शनकारियों, पत्रकारों और आम नागरिकों की लगातार बायोमेट्रिक निगरानी की गई।

याचिका के अनुसार, निगरानी के लिए कथित रूप से

  • CCTV कैमरों
  • ड्रोन
  • मोबाइल कमांड एवं कंट्रोल वाहन
  • हैंडहेल्ड डिवाइस

के माध्यम से वीडियो और तस्वीरें एकत्र की गईं।

किन तकनीकों के इस्तेमाल का आरोप?

याचिका में दावा किया गया है कि एकत्रित फुटेज को कथित रूप से

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  • ‘Ikshana’ मोबाइल निगरानी वाहन
  • ‘AjnaLens’ स्मार्ट ग्लास
  • ‘Abhigyan’ मोबाइल एप
  • National Automated Fingerprint Identification System (NAFIS)

के माध्यम से प्रोसेस और मिलान किया गया।

याचिकाकर्ता का कहना है कि इस प्रकार की बायोमेट्रिक निगरानी के लिए कोई स्पष्ट कानूनी प्रावधान उपलब्ध नहीं है।

निजता के अधिकार का उल्लंघन होने का दावा

याचिका में कहा गया है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन में शामिल लोगों की इस तरह की निगरानी भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त जीवन, गरिमा और निजता के अधिकार का उल्लंघन है।

साथ ही यह भी कहा गया है कि दिल्ली पुलिस के अपने दिशा-निर्देश तथा Criminal Procedure (Identification) Act, 2022 भी शांतिपूर्ण सभा में शामिल लोगों की इस प्रकार की बायोमेट्रिक निगरानी की अनुमति नहीं देते।

मुख्य मुद्दे एक नजर में

मुद्दा चिंता / याचिका में दावा
 चेहरे की पहचान तकनीक याचिका में दावा किया गया है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर स्पष्ट कानूनी आधार के बिना बड़े पैमाने पर फेशियल रिकॉग्निशन तकनीक का उपयोग किया गया।
बायोमेट्रिक डेटा संग्रह हजारों प्रदर्शनकारियों, पत्रकारों और आम नागरिकों के बायोमेट्रिक पहचानकर्ताओं का स्वचालित संग्रह और मिलान किए जाने का दावा किया गया है।
राष्ट्रीय डेटाबेस से मिलान याचिका में कहा गया है कि एकत्रित डेटा का राष्ट्रीय आपराधिक डेटाबेस से मिलान किया गया, जिससे निर्दोष लोगों की पहचान प्रभावित हो सकती है।
कानूनी आधार का अभाव याचिकाकर्ता का कहना है कि दिल्ली पुलिस के आदेशों या आपराधिक प्रक्रिया (पहचान) अधिनियम, 2022 में ऐसी निगरानी का स्पष्ट प्रावधान नहीं है।
Privacy Impact Assessment याचिका के अनुसार फेशियल रिकॉग्निशन तकनीक लागू करने से पहले कोई Privacy Impact Assessment नहीं किया गया।
80% Similarity Score याचिका में दावा किया गया है कि लगभग 80% समानता स्कोर को सकारात्मक पहचान माना गया, जिससे गलत पहचान की संभावना बढ़ सकती है।
महत्वपूर्ण: उपरोक्त सभी बिंदु सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में किए गए दावों पर आधारित हैं। इन पर अंतिम निर्णय न्यायालय की सुनवाई के बाद होगा।

RTI का भी किया गया उल्लेख

याचिका में दावा किया गया है कि सूचना के अधिकार (RTI) के तहत प्राप्त जवाबों के अनुसार

  • फेशियल रिकॉग्निशन तकनीक के उपयोग से पहले कोई Privacy Impact Assessment नहीं किया गया।
  • लगभग 80% समानता (Similarity Score) को सकारात्मक पहचान माना जाता है।
  • फेशियल रिकॉग्निशन तकनीक का उपयोग आंतरिक रूप से लापता व्यक्तियों की तलाश और अज्ञात शवों की पहचान जैसे उद्देश्यों तक सीमित बताया गया है।

याचिकाकर्ता का तर्क है कि इन उद्देश्यों का शांतिपूर्ण प्रदर्शन की निगरानी से कोई संबंध नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट से क्या मांग की गई?

याचिका में सुप्रीम कोर्ट से आग्रह किया गया है कि

  • फेशियल रिकॉग्निशन और अन्य बायोमेट्रिक निगरानी उपायों के उपयोग पर रोक लगाने का निर्देश दिया जाए।
  • इस प्रकार की निगरानी को असंवैधानिक घोषित किया जाए।
  • शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों की निजता और मौलिक अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित की जाए।

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