लोकसभा सीटें 850 तक बढ़ाने की तैयारी ! परिसीमन और महिला आरक्षण बिल से बदलेगा देश का राजनीतिक गणित

सरकार द्वारा पेश परिसीमन और महिला आरक्षण से जुड़े तीन अहम बिलों में लोकसभा सीटों को 850 तक बढ़ाने और 2011 जनगणना के आधार पर सीटों के पुनर्वितरण का प्रस्ताव शामिल है। जानें इसके प्रभाव।

UTN Hindi ।। Digital Team

Author | Updated: 16 Apr 2026, 08:03 AM IST | 1 min read
लोकसभा सीटें 850 तक बढ़ाने की तैयारी ! परिसीमन और महिला आरक्षण बिल से बदलेगा देश का राजनीतिक गणित
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केंद्र सरकार ने परिसीमन और महिलाओं के लिए आरक्षण से जुड़े तीन महत्वपूर्ण विधेयकों का एक सेट जारी किया है, जिन पर 16 से 18 अप्रैल तक चलने वाले बजट सत्र के विस्तार में चर्चा होने की संभावना है। ये प्रस्ताव आने वाले वर्षों में संसद की संरचना और राजनीतिक संतुलन को व्यापक रूप से प्रभावित कर सकते हैं।

संविधान (131वां संशोधन) बिल के तहत लोकसभा की अधिकतम सीटों की सीमा 550 से बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव है। इसके साथ ही, प्रत्येक राज्य को मिलने वाली सीटों का निर्धारण उसकी आबादी के अनुपात में किया जाएगा। यह आबादी संसद द्वारा निर्धारित किसी भी जनगणना पर आधारित हो सकती है, जो जरूरी नहीं कि सबसे ताज़ा ही हो।

इस बिल का एक अहम प्रावधान महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटों का आरक्षण है, जिसे परिसीमन की प्रक्रिया पूरी होने के बाद लागू किया जाएगा। यह आरक्षण 15 वर्षों तक प्रभावी रहेगा।

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लोकसभा सीटें 850 तक बढ़ाने की तैयारी ! परिसीमन और महिला आरक्षण बिल से बदलेगा देश का राजनीतिक गणित

दूसरे विधेयक में परिसीमन आयोग के गठन का प्रस्ताव रखा गया है, जिसके प्रावधान 2002 में गठित आयोग के समान होंगे। हालांकि, इस बार स्पष्ट किया गया है कि परिसीमन के लिए नवीनतम प्रकाशित जनगणना का उपयोग अनिवार्य होगा। वर्तमान प्रस्ताव के अनुसार, अगला परिसीमन 2011 की जनगणना के आधार पर किया जा सकता है।

तीसरा विधेयक इन प्रावधानों को उन केंद्र शासित प्रदेशों दिल्ली, जम्मू-कश्मीर और पुडुचेरी तक भी विस्तारित करता है, जहां विधानसभाएं मौजूद हैं।

इन प्रस्तावों के दूरगामी प्रभाव हो सकते हैं। सबसे महत्वपूर्ण बदलाव यह है कि 2026 तक लागू सीटों के ‘फ्रीज़’ को हटाने का प्रस्ताव रखा गया है। अब सीटों का पुनर्निर्धारण 2011 की जनगणना के आधार पर किया जाएगा, जिससे राज्यों के बीच लोकसभा सीटों का संतुलन बदल सकता है।

विशेषज्ञों के अनुसार, इस बदलाव से केरल और तमिलनाडु जैसे दक्षिणी राज्यों को नुकसान हो सकता है, जबकि उत्तर प्रदेश, बिहार और राजस्थान को लाभ मिलने की संभावना है। अनुमान है कि उत्तर प्रदेश और बिहार के सांसदों की हिस्सेदारी बढ़कर लगभग 25% हो सकती है, जो पहले करीब 22% थी।

हालांकि, इस कदम से प्रत्येक नागरिक के वोट का मूल्य अधिक समान हो जाएगा, लेकिन इससे राष्ट्रीय नीतियों पर कुछ बड़े राज्यों का प्रभाव भी बढ़ सकता है। संसद में इन विधेयकों पर होने वाली चर्चा देश की राजनीतिक दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएगी।

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