अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने युद्धग्रस्त गाजा के पुनर्निर्माण और प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर एक बड़ा अंतरराष्ट्रीय कदम उठाया है। ट्रंप ने भारत को अपने प्रस्तावित “Board of Peace” में शामिल होने का निमंत्रण दिया है। यह बोर्ड गाजा में शांति, शासन और पुनर्निर्माण की निगरानी करेगा।
व्हाइट हाउस के अनुसार, यह पहल ट्रंप की 20-सूत्रीय गाजा शांति योजना का हिस्सा है, जिसकी घोषणा 15 जनवरी को की गई थी। इस बोर्ड की अध्यक्षता खुद राष्ट्रपति ट्रंप करेंगे।
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क्यों अहम है भारत की भूमिका?
भारत को इस बोर्ड में शामिल किया जाना कूटनीतिक रूप से बेहद अहम माना जा रहा है। भारत के इज़राइल और फिलिस्तीन दोनों के साथ ऐतिहासिक और संतुलित संबंध रहे हैं।
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- भारत इज़राइल का रणनीतिक साझेदार है
- वहीं फिलिस्तीन को लगातार मानवीय सहायता देता रहा है
- हालिया संघर्ष के बाद भारत ने मिस्र के रास्ते गाजा को राहत सामग्री भेजी थी
- इसी संतुलन के कारण भारत को एक “स्वीकार्य देश” माना जा रहा है।
#BREAKING: US President Donald Trump’s letter to Prime Minister @narendramodi inviting him to be part of The Board of Peace for Gaza and future conflicts. @NDTV had earlier reported invitation to India by President Trump. pic.twitter.com/EwSnJKwsES
Advertisement— Aditya Raj Kaul (@AdityaRajKaul) January 18, 2026
क्या है ‘Board of Peace’ की संरचना?
व्हाइट हाउस के अनुसार, इस पहल में तीन स्तर होंगे
1 – मुख्य बोर्ड
अध्यक्ष: डोनाल्ड ट्रंप
वैश्विक शांति और पुनर्निर्माण की निगरानी
2- फिलिस्तीनी टेक्नोक्रेट कमेटी
गाजा के प्रशासन और पुनर्वास पर काम करेगी
3 -3गाजा एग्जीक्यूटिव बोर्ड (11 सदस्यीय)
इसमें शामिल होंगे
- तुर्की के विदेश मंत्री हाकान फिदान
- UN की मध्य-पूर्व समन्वयक सिग्रिड काग
- UAE की मंत्री रीम अल-हाशिमी
- इज़राइली-साइप्रस अरबपति याकिर गबाय
- कतर और UAE के अधिकारी
इज़राइल की आपत्ति
इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के कार्यालय ने इस बोर्ड की संरचना पर नाराजगी जताई है।विशेष रूप से तुर्की की भागीदारी को लेकर इज़राइल असहज है। इसके अलावा, कतर के साथ भी उसके संबंध तनावपूर्ण रहे हैं।
इज़राइली सरकार का कहना है कि इस बोर्ड के गठन से पहले उनसे कोई औपचारिक परामर्श नहीं किया गया।
वैश्विक प्रतिक्रिया: समर्थन कम, आशंका ज्यादा
हालांकि ट्रंप ने लगभग 60 देशों को निमंत्रण भेजा है, लेकिन अब तक केवल हंगरी ने खुलकर समर्थन किया है।यूरोपीय देशों समेत कई सरकारों ने चुप्पी साध रखी है।
कूटनीतिक सूत्रों के अनुसार:
- यह पहल संयुक्त राष्ट्र की भूमिका को कमजोर कर सकती है
- कई देश इसे अमेरिका-केंद्रित व्यवस्था मान रहे हैं
रॉयटर्स के मुताबिक, कई देशों ने अनौपचारिक रूप से चिंता जताई है, लेकिन सार्वजनिक प्रतिक्रिया देने से बच रहे हैं।



