नोएडा के सेक्टर-150 में हुई दर्दनाक घटना ने पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह सिर्फ एक हादसा नहीं, बल्कि लापरवाही, अव्यवस्था और संवेदनहीनता की ऐसी तस्वीर है, जिसने एक 27 वर्षीय युवक की जान ले ली। अगर वक्त पर मदद मिल जाती, तो आज युवराज मेहता जिंदा होता।
16 जनवरी की रात धुंध इतनी घनी थी कि सड़क और अधूरे निर्माण का फर्क मिट चुका था। इसी दौरान युवराज की कार फिसलकर एक अधूरे मॉल के पानी से भरे बेसमेंट में जा गिरी। हादसे के बाद युवराज ने अपने पिता को फोन कर आखिरी उम्मीद जताई ..
“पापा, मैं नाले में गिर गया हूं… मुझे बचा लो।”
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Noida, Uttar Pradesh: A car broke through the boundary wall of a drain near the Sector-150 turn in the Knowledge Park area and fell into the water-filled drain on Friday night, resulting in one death. The deceased has been identified as Yuvraj, son of Rajkumar Mehta.
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Advertisement— IANS (@ians_india) January 19, 2026
बेटे की चीखें और पिता की बेबसी
युवराज के पिता राजकुमार मेहता बताते हैं कि बेटे की आवाज सुनते ही उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। जैसे-तैसे एक कैब पकड़कर वह मौके की ओर दौड़े। रास्ते में बेटा बार-बार फोन कर अपनी लोकेशन समझाने की कोशिश करता रहा।
करीब 40 मिनट बाद पिता मौके पर पहुंचे। तब तक युवराज कार से निकलकर छत पर खड़ा हो चुका था और मदद के लिए चिल्ला रहा था। अंधेरा, ठंडा पानी और चारों तरफ सन्नाटा लेकिन जिंदा रहने की उम्मीद अभी बाकी थी।
Noida, Uttar Pradesh: On the death of Yuvraj Mehta, who fell into a drain near Sector-150 in Noida, Eyewitness Moninder Jatav says, “…I searched in the water for 30–40 minutes, but I could not find him. By the time I reached here, he had already drowned. I was late. Before me,… pic.twitter.com/u1IhAdwKxa
— IANS (@ians_india) January 19, 2026
मौके पर पहुंची पुलिस, फिर भी नहीं बची जान
पिता ने तुरंत 112 पर कॉल किया। करीब 20 मिनट बाद पुलिस पहुंची और फिर फायर ब्रिगेड। लेकिन यहीं से सिस्टम की नाकामी शुरू हो गई।
प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक
- फायर ब्रिगेड के पास प्रशिक्षित गोताखोर नहीं थे
- नाव या जरूरी रेस्क्यू उपकरण नहीं थे
- ठंडे पानी और सरिए का बहाना बनाकर अंदर जाने से मना कर दिया गया
युवराज लगातार टॉर्च जलाकर मदद मांगता रहा। वह करीब डेढ़ घंटे तक पानी में जूझता रहा, लेकिन कोई उसके पास नहीं पहुंचा।
अगर 10 मिनट पहले आते तो बच जाता
सबसे दर्दनाक बयान उस युवक का है जो वहां डिलिवरी करने आया था। उसने बताया कि वह मौके पर पहुंचा तो देखा कि SDRF और फायर ब्रिगेड के जवान सीढ़ी पर बैठे थे।
उसने खुद कमर में रस्सी बांधी और जान जोखिम में डालकर करीब 50 मीटर अंदर तक गया।करीब आधे घंटे तक पानी में तलाश करता रहा, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
उसके मुताबिक,
“अगर सिस्टम चाहता तो लड़का बच सकता था। वो मेरे आने से सिर्फ 10 मिनट पहले डूबा था।”
सिस्टम पर उठे गंभीर सवाल
इस पूरे मामले ने कई बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं
- क्या नोएडा जैसे शहर में रेस्क्यू सिस्टम इतना कमजोर है?
- बिना सुरक्षा के अधूरे मॉल खुले क्यों हैं?
- आपात स्थिति में प्रशिक्षित टीम क्यों नहीं पहुंचती?
- क्या एक आम नागरिक की जान की कीमत इतनी कम है?
प्रशासन की चुप्पी और परिवार का दर्द
सुबह तक न तो युवक का शव मिला और न ही गाड़ी। पिता पूरी रात मौके पर बैठे रहे। एक पिता, जिसने अपनी आंखों के सामने बेटे को तड़पते देखा और कुछ नहीं कर पाया।
यह हादसा सिर्फ एक एक्सीडेंट नहीं, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही से हुई मौत है।
नोएडा की यह घटना सिस्टम के खोखलेपन की जीती-जागती मिसाल है। अगर समय पर मदद मिल जाती, तो एक परिवार उजड़ने से बच सकता था। अब सवाल सिर्फ न्याय का नहीं, बल्कि जवाबदेही का है।
क्या इस मौत की जिम्मेदारी तय होगी?
या फिर यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा?



