लिव-इन रिलेशनशिप खत्म करना अपराध नहीं : सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला, जानिए पूरी बात

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि लिव-इन रिलेशनशिप खत्म करना कोई आपराधिक अपराध नहीं है। इस फैसले का समाज और कानून पर क्या असर पड़ेगा, पढ़ें पूरी रिपोर्ट।

UTN Hindi ।। Digital Team

Author | Updated: 28 Apr 2026, 11:21 AM IST | 1 min read
लिव-इन रिलेशनशिप खत्म करना अपराध नहीं : सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला, जानिए पूरी बात
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देश की सर्वोच्च न्यायिक संस्था Supreme Court of India ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि लिव-इन रिलेशनशिप को समाप्त करना अपने आप में कोई आपराधिक कृत्य नहीं माना जा सकता। यह निर्णय आधुनिक सामाजिक संरचना और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के संदर्भ में बेहद अहम माना जा रहा है।

क्या है मामला

अदालत के समक्ष एक ऐसा मामला आया था, जिसमें एक व्यक्ति पर आरोप लगाया गया कि उसने लिव-इन रिलेशनशिप में रहने के बाद संबंध खत्म कर दिया और इसे धोखाधड़ी या अपराध की श्रेणी में रखा जाए। याचिकाकर्ता की ओर से यह तर्क दिया गया कि संबंध खत्म करने से मानसिक और भावनात्मक क्षति हुई है।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि यदि संबंध आपसी सहमति से शुरू हुआ था, तो उसका अंत भी व्यक्तिगत निर्णय के तहत आता है और इसे आपराधिक रंग नहीं दिया जा सकता।

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अदालत की प्रमुख टिप्पणियां

अदालत ने अपने फैसले में कहा कि

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  • लिव-इन रिलेशनशिप एक सामाजिक वास्तविकता है
  • इसमें शामिल दोनों पक्षों को व्यक्तिगत स्वतंत्रता प्राप्त है
  • केवल संबंध खत्म करने के आधार पर आपराधिक मुकदमा नहीं बनता

यह भी स्पष्ट किया गया कि यदि किसी मामले में धोखाधड़ी, जबरदस्ती या गलत इरादे साबित होते हैं, तभी कानून हस्तक्षेप करेगा।

सामाजिक और कानूनी प्रभाव

भारत में पिछले कुछ वर्षों में लिव-इन रिलेशनशिप के मामलों में वृद्धि देखी गई है। 2011 की जनगणना और उसके बाद के सामाजिक अध्ययनों में यह संकेत मिला है कि शहरी क्षेत्रों में ऐसे संबंधों की स्वीकार्यता धीरे-धीरे बढ़ रही है।

इस फैसले से यह स्पष्ट संदेश जाता है कि कानून व्यक्तिगत रिश्तों में अनावश्यक दखल नहीं देना चाहता। साथ ही यह भी सुनिश्चित करता है कि किसी भी पक्ष के अधिकारों का हनन न हो।

विशेषज्ञों की राय

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय व्यक्तिगत स्वतंत्रता को मजबूती देता है। यह उन मामलों में भी स्पष्टता लाता है, जहां रिश्तों के टूटने को आपराधिक विवाद में बदलने की कोशिश की जाती है।

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला न केवल कानून की व्याख्या को स्पष्ट करता है, बल्कि समाज में बदलती सोच को भी प्रतिबिंबित करता है। यह निर्णय बताता है कि सहमति से बने संबंधों में व्यक्तिगत निर्णय सर्वोपरि है, और हर भावनात्मक विवाद को कानूनी अपराध नहीं माना जा सकता।

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