सोशल मीडिया पर इन दिनों एक वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें सवाल उठाया गया है, क्या भारत में लड़कों के लिए भी कोठे होते हैं?
इस सवाल ने लोगों के बीच बहस छेड़ दी है। कुछ लोगों ने इसे फिल्मों की कल्पना बताया, जबकि कई यूज़र्स ने इसे समाज की छुपी हुई हकीकत करार दिया।
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पॉडकास्ट में सामने आई सच्चाई
इस मुद्दे पर दिल्ली के GB Road से जुड़ी सामाजिक कार्यकर्ता गीतांजलि बब्बर ने अपने पॉडकास्ट में खुलकर बात की। वे ‘कट-कथा’ नाम की संस्था चलाती हैं, जो सेक्स वर्कर्स के पुनर्वास और सशक्तिकरण के लिए काम करती है।
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गीतांजलि के मुताबिक,
“दिल्ली में लड़कों के लिए कोई कोठा सिस्टम नहीं है। रेड लाइट एरिया में सिर्फ महिलाओं के कोठे होते हैं। पुरुषों या ट्रांस वुमन के लिए ऐसा कोई संगठित ढांचा नहीं है।”
उन्होंने साफ कहा कि उन्होंने अपने अनुभव में कभी भी कोठों पर पुरुष सेक्स वर्कर्स को काम करते नहीं देखा।
‘जिगोलो’ क्या होता है?
इस बहस में एक और शब्द सामने आया – जिगोलो।
गीतांजलि ने बताया कि जिगोलो वह पुरुष होता है जो पैसों के बदले महिलाओं को साथ या यौन सेवाएं देता है। लेकिन यह काम कोठों से नहीं चलता।
जिगोलो सिस्टम आमतौर पर
- ऑनलाइन प्लेटफॉर्म
- निजी एजेंसियों
- या निजी नेटवर्क के ज़रिए संचालित होता है।इसी वजह से इसे रेड लाइट एरिया से जोड़ना गलत है।
गाजीपुर नाले का जिक्र और सच्चाई
गीतांजलि ने दिल्ली के गाजीपुर नाले का भी उल्लेख किया, जहां रात के समय कुछ ट्रांस वुमन दिखाई देती हैं। हालांकि उन्होंने साफ किया कि वहां भी कोठों जैसा कोई संगठित सिस्टम मौजूद नहीं है।
दलाली का कड़वा सच
पॉडकास्ट में एक और गंभीर मुद्दा सामने आया।कई जगहों पर लड़के खुद सेक्स वर्क नहीं करते, बल्कि दलाली में शामिल हो जाते हैं। कुछ मामलों में घर की महिलाओं को इस धंधे में धकेल दिया जाता है और पुरुष दलाल की भूमिका निभाते हैं।
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समाज को सोचने पर मजबूर करता वीडियो
गीतांजलि बब्बर वर्षों से सेक्स वर्कर्स के अधिकारों और पुनर्वास के लिए काम कर रही हैं। उनकी संस्था महिलाओं को इस दलदल से बाहर निकालने और आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में काम करती है।
यह वायरल वीडियो केवल एक सवाल नहीं उठाता, बल्कि समाज की उन परतों को भी उजागर करता है जिन पर अक्सर खुलकर बात नहीं की जाती।



