भारत में स्वदेशी तकनीक से बना हाइड्रोजन कुकिंग स्टोव इन दिनों चर्चा का विषय बना हुआ है। यह स्टोव पारंपरिक LPG सिलेंडर की जगह पानी से बने ग्रीन हाइड्रोजन पर चलता है और इसकी कीमत करीब 1,50,000 रुपये प्रति यूनिट बताई जा रही है।
यह नई तकनीक न सिर्फ ऊर्जा क्षेत्र में बदलाव का संकेत देती है, बल्कि भविष्य के किचन को भी पूरी तरह बदल सकती है।
कैसे काम करता है हाइड्रोजन स्टोव?
यह स्टोव “प्लग-एंड-प्ले” तकनीक पर आधारित है, जिसमें पानी (लगभग 100 मिली) और बिजली (करीब 1 kWh) की मदद से हाइड्रोजन गैस तैयार की जाती है।
इसमें एक विशेष PEM इलेक्ट्रोलाइज़र (Proton Exchange Membrane) लगा होता है, जो पानी को हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में विभाजित करता है। हाइड्रोजन गैस को तुरंत ईंधन के रूप में इस्तेमाल किया जाता है, जबकि ऑक्सीजन वातावरण में निकल जाती है।
विशेषज्ञों के अनुसार, यह सिस्टम 6 घंटे तक खाना पकाने के लिए पर्याप्त ऊर्जा प्रदान कर सकता है।
पर्यावरण के लिए कितना फायदेमंद?
इस स्टोव की सबसे बड़ी खासियत है कि यह जीरो-एमिशन तकनीक पर आधारित है। इसमें न कार्बन मोनोऑक्साइड निकलती है, न धुआं, सिर्फ जलवाष्प (water vapor) बनती है। यानी यह पर्यावरण के लिहाज से LPG और कोयले जैसे पारंपरिक ईंधनों से कहीं ज्यादा सुरक्षित और स्वच्छ है।

आखिर इतना महंगा क्यों है?
हाइड्रोजन स्टोव की ऊंची कीमत के पीछे कई तकनीकी कारण हैं-
- इनबिल्ट इलेक्ट्रोलाइज़र तकनीक – पानी से तुरंत गैस बनाने वाली यह तकनीक काफी महंगी है।
- सुरक्षा सिस्टम – हाइड्रोजन अत्यधिक ज्वलनशील गैस है, इसलिए इसमें फ्लेम अरेस्टर, प्रेशर कंट्रोल और विशेष वाल्व लगाए जाते हैं।
- नई और सीमित उत्पादन तकनीक – अभी यह बड़े पैमाने पर नहीं बन रहा, इसलिए लागत अधिक है।
- रिसर्च और डेवलपमेंट लागत – ग्रीन हाइड्रोजन तकनीक अभी शुरुआती चरण में है, जिससे कीमत बढ़ जाती है।
क्या आम लोगों के लिए उपयोगी है?
फिलहाल यह स्टोव आम घरों के लिए नहीं, बल्कि कमर्शियल किचन, रिसर्च लैब, और सरकारी प्रोजेक्ट्स के लिए ज्यादा उपयुक्त माना जा रहा है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि जैसे-जैसे उत्पादन बढ़ेगा और तकनीक सस्ती होगी, भविष्य में यह आम घरों तक भी पहुंच सकता है।
हाइड्रोजन कुकिंग स्टोव भारत में ऊर्जा क्षेत्र में एक बड़ा नवाचार है। यह न सिर्फ LPG पर निर्भरता कम कर सकता है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण में भी अहम भूमिका निभा सकता है। हालांकि इसकी मौजूदा कीमत इसे आम लोगों की पहुंच से दूर रखती है, लेकिन आने वाले समय में यह तकनीक किफायती और लोकप्रिय हो सकती है।










