सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि यदि कोई व्यक्ति अपनी लिव-इन पार्टनर के साथ क्रूरता या उत्पीड़न करता है, तो उसके खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498A या भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 85 के तहत मुकदमा चलाया जा सकता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि कानून का उद्देश्य केवल पारंपरिक विवाह तक सीमित नहीं है, बल्कि ऐसे रिश्तों में रहने वाली महिलाओं को भी संरक्षण देना है जो “शादी जैसी प्रकृति” के हों।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला कर्नाटक के डॉक्टर बी.एच. लोकेश से जुड़ा है। उनके खिलाफ तीर्था नाम की महिला ने IPC की धारा 498A के तहत मामला दर्ज कराया था।
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लोकेश का कहना था कि दोनों केवल लिव-इन रिलेशनशिप में थे, जबकि महिला का दावा था कि वे कानूनी रूप से विवाहित थे।
कर्नाटक हाई कोर्ट ने उनके खिलाफ दर्ज आपराधिक मामला रद्द करने से इनकार कर दिया था। इसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में अपील की।
केंद्र और कर्नाटक सरकार के अलग-अलग तर्क
सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार ने दलील दी कि लिव-इन रिलेशनशिप पर IPC की धारा 498A लागू नहीं हो सकती। वहीं कर्नाटक सरकार ने कहा कि यदि रिश्ता शादी जैसा है और महिला के साथ क्रूरता हुई है, तो IPC की धारा 498A और BNS की धारा 85 दोनों लागू हो सकती हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने लोकेश की याचिका खारिज कर दी। फैसला लिखते हुए जस्टिस करोल ने कहा कि धारा 498A की संकीर्ण व्याख्या नहीं की जा सकती।
उन्होंने कहा कि यह प्रावधान महिलाओं को घरेलू क्रूरता से सुरक्षा देने के लिए बनाया गया था और इसकी व्याख्या भी उसी सामाजिक उद्देश्य को ध्यान में रखकर की जानी चाहिए। अदालत ने कहा कि यदि इस कानून को केवल पारंपरिक विवाह तक सीमित कर दिया जाए तो इसका सुधारवादी उद्देश्य कमजोर पड़ जाएगा।

‘शादी जैसी प्रकृति’ वाले रिश्तों पर भी लागू होगा कानून
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि “लिव-इन रिलेशनशिप” को उन रिश्तों के संदर्भ में देखा जाना चाहिए जो “शादी जैसी प्रकृति” के हों।
पीठ ने कहा कि आज समाज बदल चुका है और कानून को भी सामाजिक बदलावों के अनुरूप विकसित होना चाहिए। अदालत ने टिप्पणी की कि लिव-इन रिलेशनशिप अब सामाजिक वास्तविकता बन चुके हैं और कानून को ऐसे रिश्तों में रहने वाली महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए।
धारा 498A और BNS की धारा 85 क्या है?
IPC धारा 498A
- पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा महिला के साथ क्रूरता या उत्पीड़न से संबंधित प्रावधान।
- दोषी पाए जाने पर तीन वर्ष तक की सजा और जुर्माने का प्रावधान।
BNS धारा 85
भारतीय न्याय संहिता में घरेलू क्रूरता से संबंधित समान प्रावधान, जिसने IPC की धारा 498A का स्थान लिया है।
इस फैसले का क्या असर होगा?
- शादी जैसे लिव-इन रिश्तों में रहने वाली महिलाओं को कानूनी सुरक्षा मिलेगी।
- घरेलू हिंसा और मानसिक या शारीरिक उत्पीड़न के मामलों में कानूनी कार्रवाई का दायरा बढ़ेगा।
- अदालतों को ऐसे मामलों में रिश्ते की वास्तविक प्रकृति का परीक्षण करना होगा।
Frequently Asked Questions
1. क्या लिव-इन रिलेशनशिप में भी 498A लागू हो सकती है?
हाँ। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि यदि रिश्ता शादी जैसी प्रकृति का है तो IPC की धारा 498A या BNS की धारा 85 लागू हो सकती है।
2. सुप्रीम कोर्ट ने किस मामले में यह फैसला दिया?
कर्नाटक के डॉक्टर बी.एच. लोकेश की अपील पर सुनवाई करते हुए।
3. कोर्ट ने "शादी जैसी प्रकृति" से क्या मतलब बताया?
ऐसा रिश्ता जिसमें दोनों लंबे समय तक पति-पत्नी की तरह साथ रहते हों और घरेलू संबंध की प्रकृति हो।
4. क्या हर लिव-इन रिलेशनशिप पर यह कानून स्वतः लागू होगा?
नहीं। अदालत ने संकेत दिया कि प्रत्येक मामले में यह देखा जाएगा कि संबंध वास्तव में "शादी जैसी प्रकृति" का था या नहीं।
इस फैसले का सबसे बड़ा महत्व क्या है?
यह फैसला लिव-इन रिश्तों में रहने वाली महिलाओं को घरेलू क्रूरता के मामलों में कानूनी संरक्षण प्रदान करने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।




