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लचर व्यवस्था से त्रस्त सिंगरौली, बेटे के बाद मां की मौत

Rakesh Kumar Vishwakarma

Author | Updated: 31 Mar 2026, 08:07 PM IST | 1 min read
लचर व्यवस्था से त्रस्त सिंगरौली, बेटे के बाद मां की मौत
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सिंगरौली जिले में दिन प्रतिदिन स्थानीय लोगों में कमी देखने को मिल रही है, जैसे-जैसे यहां के लोग कम हो रहे वैसे ही वैसे यहां तरह-तरह की कंपनियां स्थापित हो रही है। इन कंपनियों का कहर इतना विकराल हो गया है की यहां के स्थानीय लोगों का जीवन-यापन करना भी मौत से जंग लड़ने के बराबर है। यूं देखें तो इनका मल-मूत्र, प्रदुषण, सुरक्षा और तो और इनमें चल रहे तेज रफ़्तार से बेलगाम वाहनों ने जीना मुहाल कर दिया है।

अभी आपको बता दें की रविवार की रात लगभग 07 बजे अपने मामा के यहां से अपने रिश्तेदारी में बाइक से सवार होकर जा रहे मां-बेटे को कोल वासरी में कार्य कर रही तेज रफ्तार जेसीबी ने रौंद दिया, जिससे दोनों गंभीर हो गए। वहीं मौके से दोनों को निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया , जहाँ उपचार के दौरान सेमुआर के निवासी संदीप कुमार बैस पिता सुरेन्द्र कुमार बैस ने दम तोड़ दिया। वहीं भर्ती उसकी माता फूलमती बैस पति सुरेन्द्र कुमार बैस को जबलपुर के लिए रेफर किया गया, जहाँ मंगलवार की सुबह उपचार के दौरान उन्होंने भी दम तोड़ दिया।

अब आपको बता दें की यह मामला सिंगरौली जिले के बरगवां थाना के गोंदवाली का है, जहाँ एक मां-बेटे को कुचल दिया गया। यहां एक पुरुष व महिला की मौत की बात नही है बल्कि उस घर की जिम्मेदारी को कुचला गया। क्योंकि आज वह अपने माता-पिता के साथ अपने परिवार का सहारा था, जिसे सिंगरौली की लचर व्यवस्था ने पल भर में समाप्त कर दिया।

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जब यह घटना घटी उसके बाद आक्रोशित परिजन व ग्रामीणों ने हादसे को लेकर जमकर सड़क पर हंगामा किया। जिसके बाद स्थानीय प्रशासन घटना स्थल पर पहुंची जो मोर्चा को संभालते हुए परिजनों संबल योजना का लाभ दिलाने का आश्वासन देकर मामले को शांत कराने में लग गए। NH39 में करीब 7 घंटे तक यातायात व्यवस्था पूरी तरह ठप रहा। लंबा जाम लगने से सैकड़ों वाहन फंसे रहे और राहगीरों को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ा।

सिंगरौली में हो रहे सड़क हादसे को लेकर ऐसा लगता है प्रशासन मुख दर्शक बनी हुई है और जिम्मेदार जनप्रतिनिधि मौन धारण किये हुए है। यदि ऐसा नही है तो लगातार हो रहे सड़क दुर्घटनों पर कोई बड़ी कार्यवाई क्यों नही हुई? सबसे बड़ा सवाल यह है की हादसे शिकार को मौके पे सांत्वना देने और मुवाजे के चन्द सिक्के दे देने के रश्म अदायगी से क्या न्याय मिल जाता है? क्या जिनके घर का चिराग बुझ गया है, क्या उनके घर का चिराग जल जायेगा? हादसों के चीत्कार के बाद कभी कोई जनप्रतिनिधि या जिम्मेदार उस खामोश घर को झाकने तक भी जाते है क्या? बेसुध हुए परिवार का सुध लेने की कोशिश भी करते हैं क्या?

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