पालक पनीर से भड़का विवाद, ₹1.66 करोड़ का मुआवजा मिला, ऐसा क्या हुआ?। Colorado । US । India

By: अजीत नारायण सिंह

On: Wednesday, January 14, 2026 5:09 PM

Palak Paneer controversy
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अमेरिका के University of Colorado Boulder में हुआ एक मामूली-सा किचन विवाद देखते ही देखते अंतरराष्ट्रीय चर्चा का विषय बन गया। भारतीय खाना पालक पनीर दोबारा गर्म करने को लेकर शुरू हुआ यह मामला आखिरकार नस्लीय भेदभाव और नागरिक अधिकारों के उल्लंघन के आरोपों तक पहुंचा, जिसमें दो भारतीय पीएचडी छात्रों को करीब ₹1.66 करोड़ (2 लाख डॉलर) का सेटलमेंट मिला।

मध्यवर्गीय परिवारों से आने वाले आदित्य प्रकाश (भोपाल) और उर्मी भट्टाचार्य (कोलकाता) के लिए अमेरिका की इस प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी में दाखिला किसी सपने के सच होने जैसा था। शुरुआती एक साल सब कुछ सामान्य रहा, आदित्य को फंडिंग और ग्रांट्स मिले, जबकि उर्मी का शोध कार्य भी सराहा गया। लेकिन 5 सितंबर 2023 को कैंपस किचन में घटित एक घटना ने उनकी ज़िंदगी की दिशा बदल दी।

क्या है ‘पालक पनीर विवाद’?

घटना के दिन आदित्य प्रकाश कैंपस में छात्रों के लिए उपलब्ध माइक्रोवेव में अपना लंच पालक पनीर गर्म कर रहे थे। इसी दौरान एक स्टाफ सदस्य ने खाने की “तेज़ गंध” की शिकायत करते हुए माइक्रोवेव इस्तेमाल न करने को कहा। आदित्य के अनुसार, उन्होंने शांत रहते हुए जवाब दिया कि यह सिर्फ खाना है और वे तुरंत निकल जाएंगे।

आदित्य ने सांस्कृतिक संदर्भ की बात उठाई, कि खाने की गंध को लेकर पसंद-नापसंद सांस्कृतिक होती है। जब स्टाफ की ओर से यह तर्क दिया गया कि ब्रोकली जैसी चीज़ें भी रोकी जाती हैं, तो आदित्य ने पूछा, “कितने लोगों को ब्रोकली खाने पर नस्लवाद झेलना पड़ता है?”

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यहीं से, उनके मुताबिक, “भेदभाव और प्रतिशोध का सिलसिला” शुरू हुआ। विभागीय स्तर पर उन्हें बार-बार तलब किया गया, यहां तक कि उनके खिलाफ शिकायत दर्ज कराई गई कि स्टाफ “असुरक्षित” महसूस कर रहा है।

उर्मी भट्टाचार्य के आरोप

उर्मी भट्टाचार्य का आरोप है कि उन्हें बिना किसी पूर्व सूचना या स्पष्टीकरण के टीचिंग असिस्टेंटशिप से हटा दिया गया। उनका कहना है कि यह कार्रवाई तब हुई जब उन्होंने एक कक्षा में एथ्नोसेंट्रिज़्म (जातिकेंद्रित सोच) पर चर्चा के लिए आदित्य को आमंत्रित किया था, बिना किसी का नाम लिए या घटना का विवरण दिए।

उर्मी के मुताबिक, बाद में जब अन्य छात्रों ने भी भारतीय खाना कैंपस में लाया तो उन पर “उकसावे” का आरोप लगा, हालांकि ये शिकायतें अंततः खारिज कर दी गईं।

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भेदभाव का मुकदमा और करोड़ों का सेटलमेंट

मामला तब और गंभीर हो गया जब विभाग ने दोनों छात्रों को पीएचडी के दौरान मिलने वाली मास्टर्स डिग्री देने से इनकार कर दिया। इसके बाद मई 2025 में आदित्य और उर्मी ने US District Court for the District of Colorado में सिविल राइट्स मुकदमा दायर किया।

मुकदमे में कैंपस किचन नीति को दक्षिण एशियाई समुदाय के प्रति “असमान और भेदभावपूर्ण प्रभाव” वाला बताया गया। मानसिक उत्पीड़न, भावनात्मक तनाव और पीड़ा के आरोप भी शामिल थे।

सितंबर 2025 में यूनिवर्सिटी ने मामला सुलझाते हुए 2 लाख डॉलर (लगभग ₹1.6–1.8 करोड़) का भुगतान किया और दोनों को मास्टर्स डिग्री प्रदान की। हालांकि, समझौते की शर्तों के तहत वे भविष्य में इस यूनिवर्सिटी में पढ़ाई या नौकरी नहीं कर सकेंगे।

क्या अमेरिकी कैंपस में सांस्कृतिक असहिष्णुता बढ़ रही है?

हाल ही में भारत लौटे दोनों छात्रों का मानना है कि अमेरिका में राजनीतिक और सामाजिक माहौल बदल रहा है। उर्मी के अनुसार, Donald Trump की राजनीति के बाद संस्थानों में सहनशीलता कम हुई है, खासकर प्रवासियों और रंगभेद झेलने वाले समुदायों के लिए।

आदित्य का कहना है कि यह केस “फूड रेसिज़्म” के खिलाफ एक संदेश देता है। “जब तक ऐसे मामलों में जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक बदलाव नहीं आएगा,” उन्होंने कहा।

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अजीत नारायण सिंह

अजीत नारायण सिंह बतौर पत्रकार सामाजिक विषयों और समसामयिक मुद्दों पर लिखते है। उनका लेखन समाज में जागरूकता लाने, शिक्षा, स्वास्थ्य और ग्रामीण विकास जैसे विषयों पर केंद्रित रहता है। वे सरल भाषा और तथ्यपरक शैली के लिए जाने जाते हैं।
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