मध्य प्रदेश में प्रशासनिक सख्ती : 27 महीनों में 8 कलेक्टर और 7 एसपी हटाए गए

By: UTN Hindi ।। Digital Team

On: Saturday, March 28, 2026 1:26 PM

मध्य प्रदेश में प्रशासनिक सख्ती : 27 महीनों में 8 कलेक्टर और 7 एसपी हटाए गए
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मध्य प्रदेश में पिछले 27 महीनों के दौरान प्रशासनिक स्तर पर बड़े पैमाने पर फेरबदल देखने को मिला है। राज्य सरकार ने इस अवधि में कम से कम 8 जिला कलेक्टर और 7 पुलिस अधीक्षकों (एसपी) को उनके पदों से हटाया या स्थानांतरित किया है। सरकार का कहना है कि यह कदम प्रशासनिक जवाबदेही सुनिश्चित करने और शासन व्यवस्था को मजबूत करने के उद्देश्य से उठाया गया है।

सरकारी सूत्रों के अनुसार, कई मामलों में अधिकारियों के खिलाफ लापरवाही, जन शिकायतें या कानून-व्यवस्था से जुड़े मुद्दों को आधार बनाकर कार्रवाई की गई। हाल ही में सीधी जिले के कलेक्टर को भी जनप्रतिनिधियों और नागरिकों की शिकायतों के बाद हटाया गया। इसके अलावा अशोक नगर, सागर, सीहोर, हरदा, शाजापुर और गुना जैसे जिलों में भी इसी तरह के प्रशासनिक बदलाव किए गए।

कुछ मामलों में बड़ी घटनाओं के बाद तत्काल कार्रवाई देखने को मिली। उदाहरण के तौर पर, हरदा पटाखा फैक्ट्री विस्फोट और सिवनी में सांप्रदायिक तनाव जैसी घटनाओं के बाद संबंधित कलेक्टर और एसपी को हटाया गया था। इन घटनाओं ने प्रशासनिक जिम्मेदारी और जवाबदेही पर सवाल खड़े किए थे।

हालांकि, इस सख्ती पर विपक्ष और प्रशासनिक विशेषज्ञ सवाल भी उठा रहे हैं। उनका कहना है कि कई अधिकारियों को हटाने के बाद उन्हें जल्द ही अन्य महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्त कर दिया गया। उदाहरण के तौर पर, इंदौर नगर निगम के एक अधिकारी को हटाने के कुछ ही समय बाद पर्यटन विकास निगम में महत्वपूर्ण पद दे दिया गया।

विशेषज्ञों का मानना है कि इससे सरकार के “कठोर संदेश” की प्रभावशीलता कम हो जाती है। उनका तर्क है कि यदि कार्रवाई के बाद भी अधिकारियों को समान या बेहतर पद मिल जाते हैं, तो जवाबदेही की भावना कमजोर पड़ सकती है।

दूसरी ओर, सरकार के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि अनुभवी अधिकारियों की कमी और प्रशासनिक आवश्यकताओं के कारण कई बार ऐसे निर्णय लेने पड़ते हैं। बड़े और जटिल जिलों में अनुभवी आईएएस और आईपीएस अधिकारियों की जरूरत होती है, जिसके चलते उन्हें पुनः महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दी जाती हैं।

कुल मिलाकर, यह स्पष्ट है कि राज्य सरकार प्रशासनिक स्तर पर सक्रियता दिखा रही है, लेकिन इस प्रक्रिया की पारदर्शिता और दीर्घकालिक प्रभाव को लेकर बहस जारी है। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि ऐसे फैसले वास्तव में शासन व्यवस्था में सुधार लाते हैं या केवल प्रतीकात्मक कार्रवाई बनकर रह जाते हैं।

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