मकर संक्रांति के पावन अवसर पर जब आस्था की लहरों के साथ लाखों श्रद्धालु गंगा स्नान के लिए काशी के प्रमुख घाटों पर पहुंचे, तब वाराणसी नगर निगम ने सेवा और मानवीय संवेदना की ऐसी मिसाल पेश की, जिसने बनारस की पारंपरिक मेहमाननवाजी को नई पहचान दी। कड़ाके की ठंड के बीच अस्सी घाट, दशाश्वमेध घाट और राजघाट पर स्नान कर लौट रहे श्रद्धालुओं को निःशुल्क गर्म चाय उपलब्ध कराई गई, जिससे ठिठुरते शरीर को राहत और मन को सुकून मिला।
इस सेवा अभियान का नेतृत्व महापौर अशोक कुमार तिवारी के मार्गदर्शन में किया गया। खास बात यह रही कि इस मानवीय पहल पर सरकारी खजाने का कोई भार नहीं पड़ा। महापौर ने स्वयं अपने निजी कोष से 5,000 रुपये की राशि देकर इस अभियान की शुरुआत की। उनके इस प्रेरक कदम से प्रभावित होकर नगर निगम के अधिकारियों और कर्मचारियों ने भी अपने वेतन और निजी बचत से योगदान दिया, जिससे यह पहल सामूहिक सेवा भाव का प्रतीक बन गई।
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पर्व की भीड़ को देखते हुए घाटों पर विशेष सफाई अभियान चलाया गया। साथ ही दूधिया रोशनी की बेहतर व्यवस्था की गई, ताकि श्रद्धालुओं को स्नान और आवागमन में किसी तरह की असुविधा न हो। महिला श्रद्धालुओं की गरिमा और सुविधा को ध्यान में रखते हुए अस्थायी चेंजिंग रूम बनाए गए। ठंड से बचाव के लिए घाटों और प्रमुख मार्गों पर लगातार अलाव जलाए गए, जिससे बुजुर्गों और बच्चों को विशेष राहत मिली।
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इस अवसर पर महापौर ने कहा कि काशी केवल एक तीर्थस्थल नहीं, बल्कि सेवा, संस्कार और संवेदना की भूमि है। नगर निगम का प्रयास है कि यहां आने वाला प्रत्येक श्रद्धालु स्वच्छता, सुविधा और अपनत्व के साथ काशी की आत्मीय परंपरा का अनुभव लेकर लौटे।
मकर संक्रांति के दिन घाटों पर नजर आई यह सेवा भावना बनारसी संस्कारों की जीवंत झलक थी, जिसने यह साबित कर दिया कि काशी में आस्था के साथ-साथ मानवता भी उतनी ही गहराई से बहती है।










