ख़बरों का बादशाह कौन ? अख़बार,टीवी या वेब

भारत में समाचारों की खपत को लेकर रॉयटर्स इंस्टीट्यूट द्वारा  एक एक सर्वेक्षण किया गया। जिसमें यह बात सामने आई कि टीवी पर चीखने चिल्लाने और गरमा गरम बहस के बावजूद लोकप्रियता के पहले पायदान …

भारत में समाचारों की खपत को लेकर रॉयटर्स इंस्टीट्यूट द्वारा  एक एक सर्वेक्षण किया गया। जिसमें यह बात सामने आई कि टीवी पर चीखने चिल्लाने और गरमा गरम बहस के बावजूद लोकप्रियता के पहले पायदान पर नहीं पहुंच पाई। आइए देखते हैं भारत में ख़बरों को पढ़ने का कौन सा माध्यम सबसे ज्यादा लोकप्रिय है।

ख़बरों पर सबसे ज्यादा और सबसे कम भरोसा करने वाले देश

पूरी दुनिया में 44 प्रतिशत लोग खबरों पर भरोसा करते हैं।  फिनलैंड में खबरों पर भरोसा करने वालों की संख्या सबसे ज्यादा है (65 प्रतिशत) और अमेरिका में सबसे कम (29 प्रतिशत)। भारत में लोग टीवी के मुकाबले अखबारों पर ज्यादा भरोसा करते हैं। भारत में सिर्फ 38 प्रतिशत लोग खबरों पर भरोसा करते हैं। जो अंतरराष्ट्रीय स्तर से बहुत कम है।

खोज कर पढ़ी गई ख़बरों पर ज्यादा भरोसा 

45 प्रतिशत लोगों को परोसी गई खबरों के मुकाबले खुद खोज कर पढ़ी गई खबरों पर ज्यादा भरोसा है। सोशल मीडिया से आई खबरों पर सिर्फ 32 प्रतिशत लोगों को भरोसा है। 

पसंदीदा माध्यम इंटरनेट है। 

82 प्रतिशत लोग खबरें इंटरनेट पर देखते हैं, चाहे मीडिया वेबसाइटों पर देखें या सोशल मीडिया पर। इसके बाद नंबर आता है टीवी का (59 प्रतिशत) और फिर अखबारों का (50 प्रतिशत)। 

सबसे आगे स्मार्टफोन

खबरें ऑनलाइन देखने वाले लोगों में से 73 प्रतिशत स्मार्टफोन पर देखते हैं।  37 प्रतिशत लोग खबरें कंप्यूटर पर देखते हैं और सिर्फ 14 प्रतिशत टैबलेट पर। 

सोशल मीडिया पर व्हॉट्सऐप, यूट्यूब सबसे ज्यादा लोकप्रिय 

इंटरनेट पर खबरें देखने वालों में से 53 प्रतिशत लोग व्हॉट्सऐप पर देखते हैं। इतने ही लोग यूट्यूब पर भी देखते हैं। इसके बाद नंबर आता है फेसबुक (43 प्रतिशत), इंस्टाग्राम (27 प्रतिशत), ट्विटर (19 प्रतिशत) और टेलीग्राम (18 प्रतिशत) का। 

ध्यान देने वाली बात 

आपको बता दें की यह परिणाम मुख्य रूप से अंग्रेजी बोलने वाले और इंटरनेट पर खबरें पढ़ने वाले लोगों की है। सर्वेक्षण सामान्य रूप से ज्यादा समृद्ध युवाओं के बीच किया गया था, जिनके बीच शिक्षा का स्तर भी सामान्य से ऊंचा है।  इनमें से अधिकतर शहरों में रहते हैं। अर्थात इस सर्वेक्षण में हिंदी और स्थानीय भाषाओं बोलने वालों और ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वालों की जानकारी नहीं है। यह डीडब्ल्यू वल्र्ड पर प्रकाशित चारु कार्तिकेय रिपोर्ट पर आधारित है। 

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